Saturday, 4 December 2010

अहम् अनंत स्वप्न पश्यामि

आलोक छायामय नदी वक्ष स्थल
झुके हैं वट शाखा प्रशाखा, जटाएं,
मालविका वन, तट से कुछ दूर है,
अहंकार यहाँ मृत्युमुखी, अहम् 
अनन्त पृथ्वी पश्यामि - उद्घोषित 
मन्त्र कहीं विलीनता को दर्शायें,
पुनर्जीवित हों सभी सुप्त इच्छाएं 
जागृत हों स्वप्न जो नदी ने ग्रास 
किये श्रावणी अझर वृष्टि पूर्व, 
देह धरणी, अतृप्त कामनाएं जो 
मायाजाल बिछाएं प्रति क्षण,
विछिन्न्तायें बैराग के संकेत नहीं 
होते, जीवन चक्र गतिमय प्रतिपल, 
तटिनी सम ह्रदय लिए देखूं 
एक तीर धूम्रमय पार्थिव शरीर 
दूसरे कूल नव किशलय गर्भित,
मध्य श्रोत अज्ञात,अदृश्य किन्तु 
प्रवाहित जलराशि चिर गतिमान,
यहीं अभिनव सृष्टि  का उदय 
अहम् अनंत स्वप्न पश्यामि,
--- शांतनु सान्याल 


  

2 comments:

  1. aapne to kamaal kar diya ......khub bhalo

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  2. dhanyawad - ana di - regards, its little complicated poem, i m happy that you loved it,

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