आदिम ध्रुव तारा की तरह कुछ स्मृतियां
जीवित रह जाती हैं उत्तरी आकाश में,
दूरस्थ प्रेम, नज़दीक आना चाहता
है पुनः मधुमास में, मध्य रात
की निस्तब्धता चीर कर
उतरना चाहते हैं सभी
मृत नक्षत्र, पुरातन
छत के ऊपर,
समेटना
चाहता हूँ उन को वक्षस्थल की गहराइयों
तक पुनर्जीवन के विश्वास में, आदिम
ध्रुव तारा की तरह कुछ स्मृतियां
जीवित रह जाती हैं उत्तरी
आकाश में । विस्तृत
अंतरिक्ष की
शून्यता
में
अक्सर खोजता हूँ मैं, अपनत्व के उजाले,
कुछ अधूरी बातें, कुछ बिखरे हुए शब्दों
के आलोक पुञ्ज, कुछ स्तंभित
ओस कण, छूना चाहता हूँ
मैं उन मुग्ध पलों में
अपने अंदर के
एक अदृश्य
दहन को,
वस्तुतः, कल्पनाओं के अंत से ही होता
है सत्य का पुनरोदय, धुंध रेखा
बिखरी रहती है यथावत मेरे
अस्तित्व के आसपास
में, दूरस्थ प्रेम,
नज़दीक
आना
चाहता है पुनः मधुमास में ।
* *
- - शांतनु सान्याल

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार (12-2-23} को जीवन का सच(चर्चा-अंक 4641) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
आपका हृदय तल से आभार ।
हटाएंसुंदर कविता।
जवाब देंहटाएंआपका हृदय तल से आभार ।
हटाएंअक्सर खोजता हूँ मैं, अपनत्व के उजाले,
जवाब देंहटाएंकुछ अधूरी बातें, कुछ बिखरे हुए शब्दों
के आलोक पुञ्ज, कुछ स्तंभित
ओस कण, छूना चाहता हूँ
मैं उन मुग्ध पलों में
अपने अंदर के
एक अदृश्य
दहन को... सराहनीय सृजन।
आपका हृदय तल से आभार ।
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