Saturday, 17 May 2014

अंततः - -

अंततः तमाम रास्ते पहुँचते हैं वहीँ 
जहाँ से होता है जीवन का 
उद्भव, अंकुरण और 
बिखराव के 
मध्य, 
कहीं न कहीं हम जुड़े रहे सुरभित -
समीर के संग, अदृश्य प्रणय 
बंध में एकाकार, वो 
सूत्रधार कोई 
और न 
था नियति के सिवाय, जो रहा हर 
पल नेपथ्य में मूक दर्शक बन, 
समय का अपना ही है 
आकलन, बहुत 
कठिन है 
हल करना, धुप - छाँव का ये गहन 
समीकरण - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
the most beautiful painting ever