Wednesday, 21 May 2014

वादी ए फ़रेब - -

नयापन कुछ भी न था, उसने फिर
दोहराया है, उम्र भर साथ
जीने मरने की बात,
कैसे कोई उसे
समझाए,
कि
मुमकिन नहीं रिश्तों का यूँ जावेदां
होना, फूल खिलते हैं इक दिन
न इक दिन बिखरने के
लिए, दिल भी
मिलते हैं
कहीं न कहीं टूटने के लिए, बहोत
मुश्किल है ख़्वाबों का यूँ
हक़ीक़ी गुलिस्तां
होना, उसकी
बातों में
है
बेशक, उम्मीद से लम्बे ज़िन्दगी के
रास्ते, कैसे कोई उसे बताए, कि
ज़रुरी नहीँ दूर लहराती
वादी ए फ़रेब का
नख़्लिसतां
होना !

* *
- शांतनु सान्याल

जावेदां - शाश्वत
नख़्लिसतां - मरूद्यान
वादी ए फ़रेब - आडम्बर की घाटी
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
art by cathy quiel

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