Sunday, 18 May 2014

प्रवासी आत्म - काया - -

मृगजलीय पथ से दूर, देह जब पाए
अप्रत्याशित अदृश्य छाया, तब
दर्पण से निकल आए
अपने आप स्व
प्रतिच्छाया,
जन -
शून्य उस मरू पथ का अपना ही है
सौंदर्य, समस्त अभिलाषाएं
जब विलुप्ति की ओर,
न पृथ्वी, न भव्य
आकाशगंगा,
तब
जीवन हो मुक्त माया, न कोई जहाँ
अपना या पराया, उस परम
सुख में है अन्तर्निहित
जीवन सारांश,
हर मुख
में दिखाई दे परितोष गहन, प्रत्येक
नयन में हो उद्भासित पवित्र
बिम्ब, तब कहीं जा
कर करे चिर
शयन,
प्रवासी आत्म - काया  - -

* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
Artist - NORA KASTEN

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