फटे पुराने जिल्द के अंदर से झांकती है
ज़िन्दगी, शब्दों के भीड़ से लेकिन
आ रही है अब भी सूखे गुलाब
की ख़ुश्बू, सूख कर झर
जाते हैं सभी वयोवृद्ध
पल्लव, अनुराग
कभी सूखता
नहीं, मधु -
ऋतु से
टहनियों का रिश्ता कभी टूटता नहीं ।
उन्मुक्त नीला आकाश, धूसर
पृथ्वी के वक्षस्थल पर
लिखी हुईं हरित
कविताएं,
सुदूर
मुहाने पर नदी का मौन समर्पण, न
जाने कितने अज्ञात गंतव्यों से
वार्तालाप करती मायावी
दिगंत रेखा, असंख्य
बिंबों को अपने
सीने में
समेटे
हुए
मुस्कुराता है हर हाल में जीवन दर्पण,
सुदूर मुहाने पर नदी का मौन
समर्पण, ऋणमुक्त का
सुख होता है परम
सुख, जिसका
जितना हो
तक़ाज़ा
उसे
उसका उचित भाग करें अर्पण - - - - 🌿🌿
* *
- - शांतनु सान्याल🍂

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 08 जनवरी 2023 को साझा की गयी है
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
आपका असंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंजगत से जाएँ तो निर्भार होकर, जिसका देय हो उसे देकर, हर पल भी यही भाव जगे तो जीवन तृप्ति का एक सागर बन जाता है, सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंआपका असंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंआपका असंख्य आभार आदरणीय ।
हटाएंसुंदर गुलाब सी सुंदर रचना 🌹
जवाब देंहटाएंआपका असंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंऋणमुक्त का
जवाब देंहटाएंसुख होता है परम
सुख, जिसका
जितना हो
तक़ाज़ा
उसे
उसका उचित भाग करें अर्पण
यह सुख भी सभी को कहाँ नसीब होता है काश उऋण हो सकें तो...
लाजवाब सृजन।
आपका असंख्य आभार आदरणीया ।
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