31 अगस्त, 2025

विलुप्त पल - -

उन्हें ज्ञात है अब मुमकिन नहीं मेरी वापसी,

फिर भी वो बुलाते हैं निरंतर, जब मेघ
घिर आए ईशान कोण में, ऊंची
ऊंची बिल्डिंगों के दरमियान
जब बिजली कौंधती
है आधी रात, एक
झनझनाहट के
साथ जब
हिलती
है बालकनी, वो बुलाते हैं मुझे सुदूर वनांचल
में, जहां कभी मैं दौड़े जाया करता था
खुले बदन, सभी दुःख दर्द से मुक्त
हो कर बारिश में भीगने के
लिए, काश, वो जान
पाते वेदनामय
अंतर, उन्हें
ज्ञात है
अब मुमकिन नहीं मेरी वापसी, फिर भी वो
बुलाते हैं निरंतर । वो अनाम अरण्य
नदी आज भी आवाज़ देती है
उसी अल्हड़पन से, रह रह
कर उकसाती है खोए
हुए बचपन की
मासूमियत,
वो कच्चे
रास्तों
से बहते हुए मटमैले धारे, जहां आज भी
बह रहे हैं काग़ज़ के नाव, कुछ गुज़रे
हुए पल आज भी तलाशते हैं उसी
जगह राहत भरी छाँव, बहुत
कुछ पाने की चाह में
छूट जाता है वो
छोटा सा
गाँव,
सतह पर उभरते हैं इन्द्रधनु के बिम्ब, एक
महाशून्य रहता है हिय के अभ्यंतर,
उन्हें ज्ञात है अब मुमकिन नहीं
मेरी वापसी, फिर भी वो
बुलाते हैं निरंतर ।
- - शांतनु सान्याल 



30 अगस्त, 2025

आधे अधूरे - -

बेतहाशा भटकता रहा परिपूर्णता

की तलाश में, मुद्दतों वो
रहता रहा मेरे ही
घर के बहोत
पास में,
कुछ
ख़्वाब पड़े रहते हैं फुटपाथ में
सिगरेट बट की तरह,
अर्धनिशा जागती
है न जाने
किस
मिथ्या विश्वास में, आधे अधूरे
का अंकगणित ज़िन्दगी
भर चलता ही रहा,
कभी इस
करवट
कभी
उस,अक्सर रात गुज़रती है अर्ध
निःश्वास में, सिलवटों की
तरह ख़ुद को संवारने
के सिवा हासिल
कुछ भी
नहीं,
उम्र गुज़रती है आधी किताब की
तरह फिर कभी पढ़ने की
आस में, इस अधूरेपन
में कहीं हम ढूंढते
हैं जीने की
वजह,
कुछ
मौन मुस्कुराहटें, कुछ अर्धक
सवांद, बहोत ज़रूरी हैं
जीवन प्रवास में,
बेतहाशा
भटकता रहा परिपूर्णता की तलाश
में, मुद्दतों वो रहता रहा मेरे ही
घर के बहोत
पास में ।
- - शांतनु सान्याल 

29 अगस्त, 2025

शर्तहीन - -

ज़िन्दगी में हर चीज़ शर्तहीन नहीं होते,

बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ
ऑंख बंद करके निगलना है
ज़रुरी, सच्चाई के घूँट
वैसे भी महीन नहीं
होते, ज़िन्दगी
में हर चीज़
शर्तहीन
नहीं
होते । आइना पूछता है मुस्कुराहटों के
पीछे का रहस्य, निगाहों में है रुके
हुए तूफ़ान की ख़ामोशी, रात
ढले हर एक ख़्वाब रंगीन
नहीं होते, ज़िन्दगी में
हर चीज़ शर्तहीन
नहीं होते । वो
मुझ में था
शामिल
इस
तरह कि ख़ुद का वजूद भी याद नहीं,
जब मैंने चाहा उसमें समा जाना
गहराइयों तक, उत्तर मिला
हर कोई हर किसी के
अधीन नहीं होते,
ज़िन्दगी में
हर चीज़
शर्तहीन नहीं होते । कुछ चेहरों का
तिलिस्म खींचे लिए जाता है
दूर तक, मुग्धता हमें घेरे
रहती है आठों पहर,
हम भूल जाते हैं
कि हर एक
सरोवर
अंदर
से गहीन नहीं होते, ज़िन्दगी में हर
चीज़ शर्तहीन
नहीं होते ।
- - शांतनु सान्याल

28 अगस्त, 2025

उसी जगह - -

कोई किसी का इंतज़ार नहीं करता फिर

भी लौटना पड़ता है उसी ठिकाने,
ज़माना कितना ही क्यूं न
बदल जाए ज़ेहन से
नहीं उतरते हैं
वही गीत
पुराने,
हर
चीज़ की है मुकर्रर ख़त्म होने की तारीख़,
मैंने तो अदा की है ज़िन्दगी को इक
अदद महसूल, तक़दीर में क्या
है ख़ुदा जाने, उम्र भर का
हिसाब मांगते हैं मेरे
चाहने वाले, तर्क
ए ताल्लुक़
के हैं
हज़ार बहाने, मुझे मालूम है बुज़ुर्गख़ाने
का पता, अपने ही घर में जब कोई
शख़्स हो जाए बेगाना, बाक़ी
चेहरे तब हो जाते हैं अपने
आप ही अनजाने, कोई
किसी का इंतज़ार
नहीं करता
फिर
भी लौटना पड़ता है उसी ठिकाने - - -
- - शांतनु सान्याल

23 अगस्त, 2025

मीठा एहसास - -

उतरती है धूप बालकनी को छू कर,

परछाइयों में रह जाते हैं कुछ
मीठे एहसास, दूर पहाड़ों
के ओट में सूरज डूब
चला, फिर एक
दिन डायरी
से गिर
चुका,
निकलने के बाद हल्का सा दर्द छोड़
जाता है उंगलियों में नन्हा सा
फाँस, परछाइयों में रह
जाते हैं कुछ मीठे
एहसास । नदी
का प्रवाह
सतत
खेलता है ध्वंस और निर्माण के मध्य,
इस पार हाहाकार उस पार जलोढ़
माटी का भंडार, बंजर से हो कर
खेत खलिहान, कभी उमस
भरे दिन कभी अनवरत
बरसता आसमान,
गंतव्य यथावत
कुहासामय
फिर भी
अज्ञात को पाने का अंतहीन प्रयास,
परछाइयों में रह जाते हैं कुछ
मीठे एहसास ।
- - शांतनु सान्याल

18 अगस्त, 2025

अनाश्रित - -

पुरातन अंध कुआँ सभी आवाज़ को अपने

अंदर कर जाता है समाहित, वो शब्द
जो जीवन को हर्षोल्लास दें बस
वही होते हैं प्रतिध्वनित,
दुःखद अध्याय रह
जाते हैं शैवाल
बन कर,
उभर
आते हैं उस के देह से जलज वनस्पति, वट
पीपल के असंख्य प्रशाखा, लोग भूल
जाते हैं क्रमशः उसका अस्तित्व,
वो ममत्व जो कभी करता
रहा अभिमंत्रित, पुरातन
अंध कुआँ सभी
आवाज़ को
अपने
अंदर कर जाता है समाहित । कालांतर में
कहीं कुछ शब्द बिखरे मिल जाएंगे
खण्डहरों के पत्थरों में, अज्ञात
लिपियों में लिखे रह जाते
हैं मनोव्यथाएं जिन्हें
कभी कोई पढ़
ही नहीं
पाता,
दबे रह जाती हैं जीर्ण पत्तों के नीचे अनगिनत
अप्रकाशित कविताएं, कुछ भावनाएं
होती हैं चिर अनाश्रित, पुरातन
अंध कुआँ सभी आवाज़
को अपने अंदर कर
जाता है
समाहित ।
- - शांतनु सान्याल





17 अगस्त, 2025

अन्तराग्नि - -

हर कोई सोचे अपने वृत्त में घुड़सवार, वक़्त

के हाथों घूमे काठ का हिंडोला, उम्र भर
का संचय जब निकले दीर्घ श्वास,
शून्य के सिवाय कुछ नहीं
होता अपने पास, तब
मुस्कुराता नज़र
आए अरगनी
से लटका
हुआ
ज़िन्दगी का फटेहाल झोला, वक़्त के हाथों
घूमे काठ का हिंडोला । घर से उड़ान
पुल हो कर वही हाट बाज़ार,
दैनिक शहर परिक्रमा,
पीठ सीधी करने
की अनवरत
कोशिश,
वही
टूट के हर बार बिखरने का सदमा, हज़ार
इतिकथाओं का मृत संदेश, वही
सीलनभरी दुनिया सरीसृपों
की तरह रेंगते परिवेश,
ऊपर से विहंगम
दृश्य नज़र
आए
मनोरम, वक्षस्थल के नीचे जले अनबुझ
ज्वाला, वक़्त के हाथों घूमे काठ
का हिंडोला ।
- - शांतनु सान्याल

16 अगस्त, 2025

उम्मीद की लकीरें - -

ख़्वाबों को मुसलसल सीने से लगाए रखिए,

सुबह होने तलक इस रात को जगाए रखिए,

उम्मीद की लकीरों में है छुपा जीवन सारांश,
दिल में यूँ तसव्वुर ए फ़िरदौस बनाए रखिए,

इस बज़्म की दिल फ़रेब हैं रस्म ओ रिवाज,
दहलीज़ पे इक शाम ए चिराग़ जलाए रखिए,

उम्रभर की वाबस्तगी थी लेकिन दोस्ती न हुई,
हाथ मिलाने का सिलसिला यूंही बनाए रखिए,

मुख़्तसर है इस जहां में दौर ए मेहमांनवाज़िश,
नक़ली गुलों से आशियां अपना सजाए रखिए,

कोई नहीं होता सफ़र ए ज़िन्दगी का हमसफ़र,
अकेले चलने का हौसला हमेशा बनाए रखिए,
- - शांतनु सान्याल

14 अगस्त, 2025

तूफ़ान के बाद - -

आसान नहीं तूफ़ान का पूर्वाभास,

पतंग और उंगलियों के मध्य
का सेतु ज़रूरी नहीं
हमेशा के लिए
बना रहे
निष्ठावान, मौसमी हवाओं का क्या,
उजाड़ने से पहले संभलने का
नहीं देता ज़रा भी अवकाश,
आसान नहीं तूफ़ान
का पूर्वाभास ।
नदी की
ख़ामोशी, लौह पुल से गुज़रती हुई
दूरगामी रेल, दोनों के मध्य
का समझौता ही हमें
बांधे रखता है
निःशर्त,
हम
बहना चाहते उन क्षणों में सुदूर उस
बिंदु में, जहाँ सागर और नदी
होते हैं आलिंगनबद्ध, एक
विस्मित ठहराव के
बाद देह को
मिलता
है एक
नया रूपांतरण, आवरण विहीन अंग
को तब रंग जाता है अपने रंग
में नीलाकाश, आसान
नहीं तूफ़ान का
पूर्वाभास ।
- - शांतनु सान्याल 

अंदरुनी दुनिया - -

कुछ अधूरे ख़्वाब निःशब्द आ कर

छोड़ जाते हैं मूक चीत्कार,
करवटों में ज़िन्दगी
ढूंढती है बिखरे
हुए अश्रुमय
मोती,
दूरस्थ समुद्र की लहरों में कहीं गुम है
हरित द्वीप का प्रकाश स्तम्भ, फिर
भी नहीं बुझती अंतरतम की
नील ज्योति, आहत
पंखों से जाना
है दिगंत
पार,
कुछ अधूरे ख़्वाब निःशब्द आ कर
छोड़ जाते हैं मूक चीत्कार ।
कुछ लम्हें हमारे मध्य
हैं ठहरे हुए जल -
प्रपात, भिगो
जाएंगे
एक
दिन अकस्मात, अभी आसमान है
मेघमय, इंद्रधनुष पुनः उभरेगा
रुक जाए ज़रा विक्षिप्त
बरसात, कौन भला
है अंदर तक
इस जहां
में मुतमइन, हर कोई ऊपर से दिखाता
है कुछ और, भीतर से है मगर
बेक़रार, कुछ अधूरे ख़्वाब
निःशब्द आ कर  छोड़
जाते हैं मूक
चीत्कार ।
- - शांतनु सान्याल

13 अगस्त, 2025

आसन्नकाल - -

जन्म सूत्र से गंतव्य का ठिकाना

नहीं मिलता, गर्भाग्नि विहीन
पाषाण, कभी नहीं
पिघलता ।

लोग लहूलुहान भटकते रहे
शरणार्थी बन कर, ग़र
ज्ञात होता बिन
काँटे काँटा
नहीं
निकलता ।

सद्भावना के जूलूस में
हथियारबंद निकले
वो, अगर हम
एक बने
रहते
तो देश नहीं सुलगता ।

न जाने कितने वर्ण भेदों ने हमें
निरंतर बिखेरा, आज को
बदले बिन आसन्नकाल
नहीं सुधरता ।
- - शांतनु सान्याल










12 अगस्त, 2025

बिम्ब के उस पार - -

अबूझ मन खोजता है जाने किसे प्रतिबिम्ब के उस पार, गिरते संभलते रात को खोलना

है सुबह का सिंह द्वार, परछाइयों
का नृत्य चलता रहता है उम्र
भर, दरख़्तों से चाँदनी
उतरती है लिए संग
अपने हरसिंगार,
किस ने देखा
है जन्म
जन्मांतर की दुनिया, अभी इसी पल जी लें
शताब्दियों की ज़िन्दगी, कल का कौन
करे इंतज़ार, समेट लो सभी चौरंगी
बिसात, ताश के घरों को है एक
दिन बिखरना अपने आप,
नीली छतरी के सिवा
कुछ नहीं बाक़ी,
जब टूट जाए
साँसों की
दीवार,
गिरते संभलते रात को खोलना है सुबह
का सिंह द्वार ।
- - शांतनु सान्याल

10 अगस्त, 2025

कुहासे का सफ़र - -

छाया निहित माया, स्वप्न के अंदर स्वप्न का

उद्गम, ठूँठ के जड़ से उभरे जीवन वृक्ष,
ढूंढे आकाश पथ में आलोक उत्स,
वक़्त का हिंडोला घूमे निरंतर,
दर्पण के भीतर हज़ार
दर्पण, कौन प्रकृत
कौन भरम,
स्वप्न के
अंदर स्वप्न का उद्गम । घर के अंदर अनेक
घर, हृदय तलाशे नाहक़ नया शहर,
अमर लता सम प्रणय पाश
देह बने मृत काठ, प्राण
खोजे अनवरत पुनर
जीवन का मधु
मास, एक
मोड़
पर जा रुके सितारों का जुलूस, अन्य मोड़
से निकले सुबह की धूप सहम सहम,
स्वप्न के अंदर स्वप्न
का उद्गम ।
- - शांतनु सान्याल

07 अगस्त, 2025

क्या से क्या बना दिया - -

भीगने की जुस्तजू ने इंतज़ार ए शब बढ़ा दिया,

बरसात की चाह ने हमें क्या से क्या बना दिया,

कभी हम से थी आबाद मुहोब्बत की बस्तियां,
वीरानगी है हर सिम्त जब से उसने भुला दिया,

कब गुज़रा सितारों का कारवां कुछ याद नहीं,
आधीरात से पहले भीगे जज़्बात ने सुला दिया,

संग कोयला से ही उभरता है ताब ए कोहिनूर,
सही वक़्त दर्पण ने अपने अक्स से मिला दिया,

बहोत फ़ख़्र था उसे अपनी ऊंची हवेलियों का,
ज़लज़ला ए वक़्त ने गिरने का दिन गिना दिया,

बरसात की चाह ने हमें क्या से क्या बना दिया ।
- - शांतनु सान्याल

06 अगस्त, 2025

अदृश्य हरकारा - -

शैल हो या अस्थि हर एक चीज़ का क्षरण है

निश्चित, किनारा जानता है नदी का रौद्र
स्वभाव, लहरों का आतंक फिर भी
वो बेफ़िक्र सा बना रहता है उसे
ज्ञात है कुछ पाने के लिए
कुछ खोना है लाज़िम,
सजल अनुभूति
हमें बहुधा
बना
जाती है मूक बधिर व अंध, वक्षःस्थल की
व्यथा नहीं लगती तब अप्रत्याशित,
शैल हो या अस्थि हर एक चीज़
का क्षरण है निश्चित । ये जान
कर भी हम दौड़े जाते
हैं कि क्षितिज
रेखा का
कोई
अस्तित्व नहीं, आँख लगते ही जगा जाता
है अदृश्य हरकारा, मोह के बीज पुनः
लालायित हो चले हैं अंकुरित
होने के लिए, हम छूना
चाहते हैं उस क्षण
आसमान सारा,
इसी एक
बिंदु
पर आ कर पुनः जी उठते हैं हम किंचित,
शैल हो या अस्थि हर एक चीज़ का
क्षरण है निश्चित ।
- - शांतनु सान्याल 

05 अगस्त, 2025

उस पार की दुनिया - -

जातिस्मर की तरह खोजता हूँ वो अलौकिक

द्वार, जहाँ विगत जीवन का था कभी
प्रसारित कारोबार, वो तमाम
पाप - पुण्य का हिसाब,
सत्य - मिथ्या का
पुनरावलोकन,
जानना
चाहता हूँ मृत्यु पूर्व के रहस्य, एक अंतहीन
यात्रा पूर्व जन्म के उस पार, जातिस्मर
की तरह खोजता हूँ वो अलौकिक
द्वार । भाग्यांश में कहीं आज
भी पीछा करते हैं पिछले
जनम के अभिशाप,
या हम जीते हैं
सीने में
लिए हुए अर्थहीन संताप, भटकते हैं आदि
मानव की तरह गुह कन्दराओं में
बेवजह, स्वनिर्मित अंधकार
में तलाशते हैं अंतरतम
की अखंड ज्योति,
दरअसल एक
असमाप्त
मायावी
स्वप्न
ख़ुद से बाहर हमें निकलने नहीं देता, लौट
आते हैं उसी जगह जातिस्मर की
तरह बारम्बार, जातिस्मर की
तरह खोजता हूँ
वो अलौकिक
द्वार ।
- - शांतनु सान्याल


04 अगस्त, 2025

महाशून्य से हो कर - -

मिट्टी के गुल्लक में बंद थे ख़्वाबों के मोहर,

टूटते ही बिखर गए मुद्दतों के भीगे धरोहर,

इंद्रधनु सा उभरे कभी जलप्रपात के ऊपर,
कांच की बूंदे रुकती नहीं हथेली में पलभर,

नेह के बादल उड़ चले हैं तितलियों के संग,
सुदूर द्वीप में सज चले हैं जुगनुओं के शहर,

रेशमी छुअन गुज़रती है देह प्राण से हो कर,
जी उठते हैं सुप्त कोश रात्रि के अंतिम पहर,

शिराओं से हो कर बहती है प्रणय गंध धारा,
मद्धम सुर में अंतर्ध्वनि गाएं गीत ठहर ठहर,

महाशून्य में बहते जाएं आलोक स्रोत के संग,
छोड़ जाएं सभी बंध अपनी जगह उसी डगर, ।
- - शांतनु सान्याल 

02 अगस्त, 2025

उतार की ओर - -

धुआं सा उठे है वादियों में बारिश थमने के बाद,

राहत ए जां मिले इश्क़ ए ख़ुमार उतरने के बाद,

मिलने को आए लोग जब याददाश्त जाती रही, फ़िज़ूल हैं दुआएं उम्र की दोपहर ढलने के बाद,

ख़्वाबों की रंगीन फिरकी हाथों में वो थमा गए,
आँखों में है नशा बारहा गिर के संभलने के बाद,

वो रहज़न था या कोई पैकर ए जादूगर पोशीदा,
होश में लौटे; दूर तक साथ उसके चलने के बाद,

बहुत मुश्किल है; गहराइयों का सही थाह करना, वक़्त नहीं लौटता रुख़ से कलई निकलने के बाद,
- - शांतनु सान्याल

31 जुलाई, 2025

अंध परिधि - -

उस मोड़ पे कहीं था मन्नतों वाला दरख़्त,

जिसकी डालियों से लटके रहते थे
मुरादों के रेशमी डोर, राहगीर
जिसकी परछाई में पाते
थे पल भर का सुकून,
एक स्रोत जहाँ
हर चेहरा
निखर
जाए, न वो कुआं ही रहा, न वो प्रतिबिंब,
न वो चौबारा जहाँ से कभी उठती
थी सांझे चूल्हों की महक, न
जाने कितने हिस्सों में
बँट चुका समुदाय
हमारा, चेहरे
से चमक
ही नहीं,
बहुत
कुछ छीन लेता है हर पल बदलता हुआ
वक़्त, उस मोड़ पे कहीं था मन्नतों
वाला दरख़्त । वही वयोवृद्ध
वट वृक्ष, वही नदी का
किनारा, उजान की
ओर लौटतीं
नौकाएं,
सांध्य
प्रदीप के साथ गूंजता पक्षियों का कलरव,
शंख बेला में लौटते हुए गोवंश, सब
कुछ आज भी हैं विद्यमान, बस
अनुभूति कहीं खो सी गई
है, रिश्तों के दरमियान
अब वो गर्मजोशी
न रही, लोग
हज़ार
हिस्सों में बँट चले, अपने अपने दायरे में
सिमटे हुए, अपनी दुनिया में हैं सिर्फ़
आसक्त, उस मोड़ पे कहीं था
मन्नतों वाला दरख़्त ।
- - शांतनु सान्याल

28 जुलाई, 2025

उन्मुक्त सीप - -

सत्तर साल से उठाता रहा सूखे पत्तों का ढेर,

कहीं कोई सुख जीवाश्म मिल जाए देर सबेर,

अंतिम चाह का क्या कीजै निब टूटने के बाद,
तक़दीर के आगे नहीं चलता कोई भी हेर फेर,

एक अदद हमदर्द की तलाश करते रहे ताउम्र,
एक से छूटे कहीं तो हज़ार वेदनाएं लेते हैं घेर,

बिहान की आस में सीते रहे उम्मीद की चादर,
अपना ढहता ओसारा उगता सूरज ऊंचे मुँडेर,

अपने साध में लगे हैं सभी क्या साधु या स्वांग,
मूक अभिनय के हैं सभी पात्र अपने या हों ग़ैर,
- - शांतनु सान्याल 

27 जुलाई, 2025

जन्म दिन - -

ख़त्म कहाँ होता है स्वयं से खेलने का हुनर,

उम्र गुज़रता रहा रुकता नहीं दिल का सफ़र,

फिर मुँडेर पे कोई शाम ए चिराग जला गया,
हद ए निगाह में फिर खिल उठे हैं गुलमोहर,

न जाने कौन है जो रख गया रंगीन लिफ़ाफ़ा,
अदृश्य ख़ुश्बूओं का पता ढूंढती है मेरी नज़र,

फिर लोगों ने एक मुद्दत के बाद किया है याद,
न जाने किस के दुआओं का है ये गहरा असर,
- - शांतनु सान्याल 

26 जुलाई, 2025

पुनरागमन - -

सृष्टि का बाह्यरूप अभी तक है थमा हुआ,

अंदर अनवरत प्रसारित हैं असंख्य कीट
संसार, शाखा प्रशाखाओं में छुपे हुए
हैं अनगिनत मकड़जाल, अनेक
रंगीन छत्रक उभर आए हैं
धरा के वक्षःस्थल पर,
अदृश्य विषदंत पर
कोई रख गया है
फूलों वाला
रेशमी
रुमाल, शाखा प्रशाखाओं में छुपे हुए हैं - अनगिनत मकड़जाल । शायद तुम
उसे पहचानते नहीं, यूं भी इस
प्रजन्म को इतिकथा पसंद
नहीं, क्षत विक्षत देह ले
कर वो चला जा
रहा है छाया
हीन, कहीं
दूर द्वीप
में, जहाँ प्रकृति निर्भय हो कर बिखेरती
है अपना वरदान, भेदभाव विहीन
एक ऐसी जगह जहाँ देह प्राण
को मिले मुक्ति स्थान, वो
पुनः लौटेगा एक दिन
रचेगा प्रकृत रंगों
से जर्जर सृष्टि
का शापित
भाल,
शाखा प्रशाखाओं में छुपे हुए हैं अनगिनत मकड़जाल ।
- - शांतनु सान्याल




आग़ाज़ ए सफ़र - -

सुरंगों से हो कर गुज़रती है रात, सीने

में फड़फड़ाते हैं इतिहास के पृष्ठ,
अंधेरे उजाले के मध्य खो से
जाते हैं कहीं उम्मीद भरे
स्वाधीन पहर, बहुत
कुछ चाहा था
हमने अग्नि
शपथ
लेने
से पहले, मशाल की लौ में उभरते हैं
शैल चित्र, धूसर शून्यता घेरे हुए,
प्रश्नों के भीड़ में भयभीत सा
छुपा बैठा है कहीं उत्तर -
जीविता का उत्तर,
अंधेरे उजाले
के मध्य
खो से
जाते हैं कहीं उम्मीद भरे स्वाधीन
पहर । परछाई का वादा था
झूठा, हम चलते रहे दूर
तक अज्ञात ही रहा
मरुभूमि का
सीमांत, न
कोई
दरख़्त, न कोई सराय, न दूर तक
एक बूँद की झलक, दरअसल
हम एक ख़्वाब में जन्में थे
और उसी ख़्वाब में एक
दिन खो जाएंगे, जो
पल साथ गुज़ारे
बस वही सच
थे बाक़ी
फ़रेब,
कुछ उम्मीद हैं बहुत ही ज़िद्दी हमें
बारम्बार लौटा लाते हैं नए
उभरते हुए ख़्वाब के
अंदर, एक नए
शुरुआत के
संग फिर
आग़ाज़ ए सफ़र - -
- - शांतनु सान्याल 

24 जुलाई, 2025

परिचयहीन - -

एक सरसरी नज़र से उसने मुझे देखा

और सिरे से नज़रअन्दाज़ कर गया,
दरअसल इस में उस शख़्स का
कोई दोष नहीं, हम अपना
पुरातन धूसर शल्क
अब तक उतार
न पाए, वो
अपना
फ़र्ज़
निभा गया, हम अपना परिचय पत्र
ढूंढते रह गए, बड़ी ख़ूबसूरती
से हमें प्रतिध्वनि विहीन
आवाज़ कर गया,
एक सरसरी
नज़र से
उसने
मुझे देखा और सिरे से नज़रअन्दाज़
कर गया । उस मंच की सीढ़ियां
पहुंचती हैं सरीसृपों के देश
तक, मेरे पृष्ठवंशों को
झुकने की आदत
न थी बस इसी
विरोधभास
ने मुझे
अपने शहर में अजनबी बना दिया,
न कोई अभ्यर्थना, न कोई
मिथ्या स्तुति, आईने ने
वक़्त रहते मुझे
एक अदद
अगले
दर
का परिचयहीन आदमी बना दिया,
मुद्दतों से चाहता रहा कि इस
अमूल्य मिट्टी से यूं ही
जड़वट जुड़ा रहूँ,
बहुत अंदर
तक, वो
न चाह
कर
भी मुझको उम्रदराज़ कर गया, एक
सरसरी नज़र से उसने मुझे देखा
और सिरे से नज़रअन्दाज़
कर गया ।
- - शांतनु सान्याल

23 जुलाई, 2025

निरुत्तर पल - -

सारा शहर है गहरी नींद में, झींगुर ध्वनि

के मध्य झर रही हैं श्रावणी बूंदें,
निस्तब्धता चीरती हुए रात
काँपते हाथों हिलाती है
साँकल, पूछती है
न जाने किस
का पता,
देह
पड़ा रहता है बिस्तर पर निर्जीव काठ सा,
उन अस्फुट शब्दों में ज़िन्दगी खोजती
है मायावी आवाज़ को, उठ कर
छूना चाहती है दहलीज़ से
लौटती हुई एक अनाम
ख़ुश्बू को, रोकना
चाहती है उसे
अपने साँसों
के अंदर,
लेकिन
रात कहाँ रुकती है किसी के रोके, उस
का सफ़र क्षितिज तक रहेगा जारी,
किसी तरह उठ कर कपाट
खोलता हूँ, कहीं कोई
पद चिन्ह ग़र दिखे,
भीगे आँगन में
कुछ सफ़ेद
फूल बिखरे हुए हैं बेतरतीब से, रात अपने
साथ कदाचित सभी ख़्वाब भी समेट
ले गई, दूरस्थ पहाड़ों से उठ रहा
है धुंआ या वाष्प कण, किसे
ख़बर ? कुछ प्रश्न रहते
हैं चिर निरुत्तर ।
- - शांतनु सान्याल

22 जुलाई, 2025

मुलाक़ात हो कभी - -

मर्माहत पतंग की डोर ढूंढती

है अंतिम ठिकाना, उस
दरख़्त के शाख से
कभी हमें भी
मिलवाना ।
अनगिनत वेदना समेटे अटूट
है रूहानी पतवार,भीगे
पंख लिए पखेरू को
गंतव्य तक
पहुंचाना ।
इस रास्ते में नहीं बहती कहीं
कोई आकाश गंगा,पत्थरों
के शहर में है ये शीशे
का घर ज़रूर
आना ।
उजाड़ कर दिल का चमन
हरहाल में हैं मुस्कुराए,
शिकायत किसी से
नहीं बियाबां से
है आना
जाना ।
न जाने किस दुनिया की
ख़्वाबिदा बात करते
हो, बहुत मुश्किल
है हक़ीक़त से
बच के निकल
पाना ।
- - शांतनु सान्याल 

18 जुलाई, 2025

अभी से क्यूं जाएं - -

अमर शब्दांश अधूरा था प्रेम प्रत्यय जुड़ने

से पहले, हज़ार बार मुड़ के देखा किए
गुलमोहरी राह में दूर तक, कहीं
कोई न था अपने साया के
सिवा ख़ुद की तलाश
में निकलने से
पहले, कुछ
भी नहीं
है यहाँ चिरस्थायी, फिर भी हम बुनते हैं
नित नए सपनों के शीशमहल, कितने
अभिलाषों का कोई अभिलेख
नहीं होता, फिर भी हम
लिखते हैं रेत पर
उम्मीद भरी
कविता
सब कुछ बिखरने से पहले, अमर शब्दांश
अधूरा था प्रेम प्रत्यय जुड़ने से पहले ।
इस बात की ख़बर है हम को
अच्छी तरह कि एक दिन
पहुँचना है निःशब्द
नदी किनारे,
अभी से
क्यूं
खोजें प्रस्थान पथ, अभी कुछ दूर और
है चलना हमें बाँह थामे तुम्हारे,
बहुत कुछ देखना समझना
है बाक़ी, कोई अफ़सोस
न रहे दिल में मरने
से पहले, अमर
शब्दांश
अधूरा था प्रेम प्रत्यय जुड़ने से पहले ।
- - शांतनु सान्याल

उजाले की बात - -

जिस जगह में कभी हमने उजाले की

बात की थी उस जगह नदी अंधेरे
में तलाशती है स्मृति मशाल,
वो बूढ़ा बरगद आज भी
है मौजूद कुछ झुका
हुआ कांधे पर
थामे हुए
सारे
जहां का दर्द, खड़ा है अपनी जगह
यथावत, उसकी उलझी जटाएं
कभी थकती नहीं, निरंतर
खोजती हैं सिक्त भूमि,
सब कुछ लुटा कर
भी वो होता नहीं
कंगाल, उस
जगह नदी
अंधेरे
में तलाशती है स्मृति मशाल । जिस
जगह हमने मिल कर लिया था
अग्निस्नान का शपथ उस
जगह आज भग्न
देवालय के
सिवा
कुछ नहीं बाक़ी, बिखरे हुए ईंट पत्थरों
में गुम हैं शिलालेख के वर्णमाला,
उन का मर्म सिर्फ़ नदी जानती
है, उस ने बड़े नज़दीक से
देखा है विपप्लवी
मशालों की
लौ को,
नदी
सब सुनती है, परेशान हो कर देखती
है बढ़ते हुए कंक्रीट के जंगल को,
कल क्या होगा कहना आसान
नहीं, रौद्र रूप डूबा भी
सकता है सारे शहर
को, वैसे अभी
तो शांति है
बहरहाल,
उस
जगह नदी अंधेरे में तलाशती है स्मृति
मशाल ।
- - शांतनु सान्याल 

16 जुलाई, 2025

अदृश्य दहन - -

एक जटिल जाल में गुथा हुआ ये शरीर

चाहता है मुक्त होना किसी मसृण
स्पर्श से, जीवन का सौंदर्य
छुपा रहता है अदृश्य
उष्ण श्वास के
छुअन में,
कांच
के शोकेस में सज्जित पुस्तकों में नहीं
मिलेगी आत्म सुख की परिभाषा,
कुछ एहसास निर्जीव से पड़े
रहते हैं अंधकार पृष्ठों के
अंदर शापित
जीवाश्म
की
तरह, मुक्ति पथ के दोनों दरवाज़ों में
होते हैं अंकित अबूझ प्रेम के
इतिकथा, जिसे सिर्फ़
वही पढ़ सकता है
जिसे ज्ञात हो
दृग भाषा,
अतल
में
उतर कर जो ढूंढ लाए अमर प्रणय
मणि, उसे ही मिलता है अनंत
सुख जीवन दहन में, जीवन
का सौंदर्य छुपा रहता है
अदृश्य उष्ण श्वास
के छुअन में ।
- - शांतनु सान्याल

10 जुलाई, 2025

शब्दों के उस पार - -

अंधकारमयी नदी ढूंढती है

जुन्हाई भरा किनारा,
अंतःस्थल के गहन
में रहता है
अंतहीन
उजियारा ।

मृग और मृगया के दरमियां
है बचे रहने का संघर्ष,
निर्बल की मृत्यु है
तय बाकी
भानुमति
का पिटारा ।

ख़्वाबों का फेरीवाला बेच
जाता है रंगीन बुलबुले,
शून्य हथेलियों में
रह जाता है
मृत आदिम
सितारा ।

हर सुबह देखता हूँ मैं दिगंत
के बदलते हुए रंग को
हर मोड़ पे वही
मदारी जमूरे
वाले खेल
का
नज़ारा ।

खड़ा हूँ अंतिम छोर में लिए
वजूद का प्रमाण पत्र
बिखरे पड़े हैं
मुखौटे उठ
चुका
मीना बाज़ार
सारा ।
- - शांतनु सान्याल












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