Tuesday, 30 September 2014

तेरी सांसों में कहीं - -

ये इश्क़ कहीं न जां से गुज़र जाए,
न देख फिर मुझे यूँ पुरअसरार
निगाहों से, जुम्बिश ए
जुनूं, कहीं दिल
से न छलक
जाए !
रहने दे भरम ज़िन्दा, यूँ ही मेरे -
जिस्म ओ जां में कि, तू है
मुक्कमल शामिल,
रूह ए गहराई
में दूर
तक, रहने दे यूँ ही लापरवाह मुझे
अपने पलकों के ज़ेर ए साया,
कहीं छूते ही सुरमयी
अहसास न बिखर
जाए !
तेरी सांसों में कहीं है मेरी मंज़िल,
काश ! ये वक़्त ज़रा ठहर
जाए, ये इश्क़ कहीं
न जां से गुज़र
जाए,

* *
- शांतनु सान्याल


 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
art by Marchella Piery.jpg 2