Sunday, 5 December 2010

जिस्म को हमने जला दिया

१.जिस्म को हमने जला दिया
मुक़दस आग की तरह,
तुमने ग़र न देखा धुआं
अक़ीदत का  क्या कसूर
हमने ख़ुद को मिटा दिया
अनचाहे  बैराग की तरह,

२.कहाँ से लायें वो यकीं
जो ख़ुदा को लाये सामने
हमने ख़ुशियाँ मिटा दी
उजड़े सुहाग की तरह,

३.तुम्हारे इश्क़ में खो सी
 गयीं,हमारी पहचान
दिल में छुपाये रखा
तगाफुल अनमिट दाग़ की तरह

४.इस जुस्तज़ू में उम्र कट गई
के लौटेंगे बहारें एक दिन
हैं सदियों से बिखरे अरमां
सूखे वीरां किसी बाग़ की तरह

५.फूलों के मौसम आये गए
आसमां रंग बदलता रहा
हमने ख़ुद को भुला दिया
पुराने नगमा-ऐ-राग की तरह
जिस्म को हमने जला दिया
 मुक़दस आग की तरह //
-- शांतनु सान्याल