Thursday, 2 December 2010

पुरातन देवालय

दूर तक तैरतीं काई, जलोच्छ्वास लेते कुछ
कमलिनी जब देह बने जलासय
तट के कचनार, वन्य कुसुम, हरित तृण
बांस वन तक चाहें जल समाधि
मन्त्र मुग्ध मृग दल पिपासा लिए सहमें
कुछ पल ठहरें, अंतर्मन सरीसर्प
न जाने कब हों जागृत और ग्रास हो जाएँ,
रहस्यमयी, स्थिर जलराशि गहन
अनंत, अंधकार थाह न जाने कोई, प्रवेश
सहज, सुगम मनोहर, निर्गमन द्वार
हों जैसे अनिर्मित भ्रमित संसार
छायामय चिर धरातल, निश्वास विहीन
तलछट समेटे महादहन निशिदिन
प्रति पल अदृश्य  अग्निशिखा प्रज्वलित,
भोर में उठतीं वाष्पीकृत वेदनाएं
पर्यटक खोजें निसर्ग सौन्दर्य, ह्रदय मध्य
गिरतें  प्रति  क्षण पुरातन देवालय,
--- शांतनु सान्याल