Friday, 12 November 2010

ग़ज़ल


ग़ज़ल

शायद कभी वो आये बज़्म में भूली याद की तरह
अपने दर्द-वो-अलम को यूँ ही सहलाये रखिये ,
फ़िज़ा ओ वादी में फिर धुप खिली है सहमी सहमी
अहाते दिल के कुछ मौसमी फूल सजाये रखिये ,
न जाने किस मोड़ पे उसका पता लिखा हो ऐ दोस्त
क़दीम ख़तों से दिल को यूँ ही बहलाए रखिये ,
हर दर पे है रौशन चिराग़, इस श्याह रात में लेकिन
अंधेरों से भी दोस्ती अक्सर निभाए रखिये ,
चाँद ढलते फिर उठीं हैं, जाग साहिल की सिसकियाँ
परछाइयों से भी, कभी कभी दामन बचाए रखिये,
आइना है बहोत जिद्दी, कोई समझौता न करना चाहे
बीती लम्हात के अक्स दिल में बसाये रखिये ,
निगाह अश्क से थे लबरेज़ , अहसास-ऐ- शबनम सही
दिल की ख़ूबसूरती यूँ ही दोस्त बनाये रखिये ,
-- शांतनु सान्याल