Friday, 26 November 2010

अंखियन बरसत नीर

हिय की बतियाँ कोई न जाने, अंखियन बरसत नीर
अगन  बिन लौ की, निशदिन तिल तिल झरत शरीर,
हिन्डोलित अलस  नयन, ज्यूँ बकुल लचकत डारी डारी,
देह अन्तःरंग बिलसित,कदम्ब झुके जस  जमना तीर,
भरमाय चंद्रमल्लिका शेष पहर, अम्बुआ मुकुल सम
पग झटकत मृग अकुलाय, मधुरिम  बहत  समीर,
पिघलत शशि कोर कोर, रह रह महुआ झर जाय
मधुर सुगंध, अंचरा भर भर  जाय बनफूलन के सखी
पोर पोर रंग भरी किसने, बिन होरी उड़त रंग अबीर,
उठत हूक बंसी के, जिया घबराय, पथ भरमाय
चाहे मन सकल तज दूँ मैं, पिय बिन छलकत धीर ,
निशब्द समीह, कान्हा बांधत रह रह  मधु बाहू डोर
हिरनी सम ब्रज बाला, गिरत परत, होत अधीर //
-- शांतनु सान्याल
( इस कविता में मघधीय अपभ्रंश का प्रयोग है, आशा है कि शब्दों की मिठास को समझेंगे - जैसे हिरन न की हिरण)