Tuesday, 16 July 2013

गुज़िश्ता रात - -

अश्क अनमोल या क़तरा ए जज़्बात !
न जाने क्या थे वो सुलगते मोती,
बूंद बूंद गिरते रहे सीने पे 
तमाम रात, कोई 
आतफ़ी -
तुफ़ान गुज़रा है जिस्म ओ जां से हो 
कर यूँ गुज़िश्ता रात ! कि वजूद 
पूछता है अपने ही अक्स 
का ठिकाना, आईना 
भी है गुमसुम,
साया भी 
मेरा नज़र आए बेगाना, किस सिम्त 
न जाने लौट गयीं ख़्वाबों की 
बदलियाँ रात ढलते !
इक अहसास 
ए सहरा 
के सिवा मेरे दामन में अब कुछ नहीं, 
* * 
- शांतनु सान्याल 
dripping droplets - -