Thursday, 25 July 2013

रुख़ तेरी परछाई का - -

आईना ए जहान मांगता है, मुझसे 
सबूत मेरी शनासाई का, कहाँ 
तक सुनाएं ये ज़िन्दगी,
दर्दे दास्तान तेरी 
बेवफ़ाई का,  
कभी तू उस किनारे सिमट जाए -
कभी तक़दीर हमें समेट ले 
अपने किनारे, नदी 
की मानिंद है 
इश्क़ 
तेरा, किसे बताएं रुख़ तेरी परछाई 
का - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 



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