Monday, 22 July 2013

झूलता पुल - -

कोई झूलता पुल है दरमियां अपने 
या उतरता ख़ुमार पिछले 
पहर का, वो मेरे 
दिल में हैं 
नुमाया या तासीर उनकी शोख़ -
नज़र का, वो मेरे रूबरू हैं 
या नशा किसी 
अनजान 
सहर का, जिस्म चांदनी और रूह 
संदली ! वो कोई पैकर ए 
ख़्वाब है या अक्स 
आसमानी -
शहर का !
* * 
- शांतनु सान्याल  
Unknown Artist quite dusk Painting