Monday, 1 July 2013

रूह तक उतरो कभी - -

कभी हो सके तो मेरी रूह तक उतरो, काफ़ी 
नहीं लब छू कर, गहराई का अंदाज़ 
करना, आईने की भी अपनी 
हैं मजबूरियां ! आसां 
नहीं चेहरे की -
इबारत 
यूँ पढ़ना, तुम्हारी ख़्वाहिशों में है नुमायां -
लज़्ज़त ए बदन की महक, मेरी 
जुस्तजू में हैं शामिल 
ख़याल से परे 
नेमत 
बेशुमार ! ये वो चाहत है जिसे लफ़्ज़ों में - - 
बयां करना है नामुमकिन, इक 
जुनूं सूफ़ियाना, जो ले 
जाए वजूद, इक 
अजीब 
इसरार की जानिब, जो नाज़िल भी है और 
पोशीदा भी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
art by annette winkler