24 अगस्त, 2026

एक बूंद - -

कंटीले तार पर थमा हुआ एक बूंद 
वर्षा जल, जीवन - मृत्यु के
सीमांत पर एक ठहरा
हुआ एहसास
सदियों
से है
अविकल, कोहरे में ढकी ये सुंदर
घाटियां, पहाड़ों से बहते हुए
ख़ूबसूरत वेगवान झरने,
आज भी बिखेरते हैं
ज़िन्दगी में रंगीन
सपने, सब
कुछ
अपनी जगह रहेगा अचल, समय
के दर्पण में लेकिन ये चेहरा
जाएगा ढल, कंटीले तार
पर थमा हुआ एक
बूंद वर्षा जल ।
- - शांतनु सान्याल



18 अगस्त, 2026

धुंधले शब्दों के परे - -

नदी के दोनों किनारों की है अपनी

ही एक अलग कहानी, एक
तरफ जनशून्यता, दूसरी
ओर अंतहीन कोलाहल,
लहरों में बहते हुए
कुछ फूल, बुझे
हुए धूप की
काठी पर
प्रणय
गंध
की है धुँधली सी निशानी, नदी के 
दोनों किनारों की है अपनी ही
एक अलग कहानी । कोई
न था दूर तक, पीछे
मुड़ कर देखना
रहा अर्थहीन,
गहराइयों
में रहते
रहते
जीवन हो जाता है अंध मीन, उसे
पता नहीं चल पाता सतह की
परेशानी, नदी के दोनों
किनारों की है
अपनी ही
एक
अलग कहानी । उस मोह के धागों
में उलझे दिवा रात्रि शलभ सम
निरीह जीवन, अंतिम पहर
शून्य हथेली, कुछ भी
नहीं होता करने
को अर्पण,
दीर्घ
निश्वास के संग समाप्ति की ओर
तब नगर भ्रमण, धुंधले शब्दों
के नेपथ्य में कहीं दूर तब
कविता जानी पहचानी,
नदी के दोनों किनारों
की है अपनी ही
एक अलग
कहानी ।
- - शांतनु सान्याल

13 अगस्त, 2026

आंशिक सत्य - -

कुछ सत्य था, कुछ इंद्रधनुष !

समझ पाना था कठिन
आख़िर जीवन रहा
इतने दिन किस
के हस्तगत,
उजाले
और
अंधेरे के मध्य खोजता रहा पसंद 
अपनी, हालांकि चाहतें जीती
रहीं किसी और के मातहत,
समझ पाना था कठिन
आख़िर जीवन रहा
इतने दिन किस
के हस्तगत ।
कुछ महज़
ख़्वाब
थे आसमानी, कुछ प्रेम बेहिसाबी,
सोच ही न पाए दरअसल हम
हैं आख़िर किस पथ के
अनुगामी, दौड़ते
रहे बेतहाशा
परछाइयों
के पीछे
अनवरत, समझ पाना था कठिन
आख़िर जीवन रहा
इतने दिन किस
के हस्तगत ।
- - शांतनु सान्याल

06 अगस्त, 2026

अंतर्ध्वनि - -

तारों का टूटना और बिखरना 
अनादिकाल से 
है जारी,
आकाश निहारता है
चिर निर्विकार,
दिवा स्वप्न
विलासी
ये जीवन चाहे आलोकमय
चंद्रहार, कोई नहीं जाने
कल प्रस्थान की है
किस की बारी,
तारों का
टूटना
और बिखरना अनादिकाल से है
जारी । अशेष नक्षत्रों में जिसे
खोजते हैं वो प्रकाश बिंदु
छुपा रहता है अंतरतम
में कहीं, वो मोती
जो त्रिलोक
में भर
दे
अविरल आलोक, कदाचित
मिलता है हृदयस्थ
गहनतम में
कहीं,
वो महत दाता हो कर भी रहता
है सदा प्रणय भिखारी, तारों
का टूटना और बिखरना
अनादिकाल से
है जारी ।
- - शांतनु सान्याल 

01 अगस्त, 2026

अंतिम बूंद - -

ईथर की तरह विलीन हो जाएंगे

एक दिन सभी अंतर के सुप्त
दहन, उम्र से लंबी  है
चाहतों का
सूचीपत्र,
अंतिम
बिंदु में भी लगे ठहरा हुआ सा
ख़्वाहिशों का एक बूंद इत्र,
सभी लोग हैं बंधे हुए
अदृश्य डोर से
न कोई
यहां
किसी का चिर बैरी न कोई गहरा मित्र, सब 
कुछ नियति के
हाथों में, क्या प्रारब्ध
क्या अन्त्य मिलन,
ईथर की तरह
विलीन हो
जाएंगे
एक
दिन सभी अंतर के सुप्त दहन ।
- - शांतनु सान्याल




30 जुलाई, 2026

अन्तर प्लावन - -

पृथ्वी और आकाश जब एकाकार, सघन गाढ़ अंधकार, मर्म को

स्पर्श करती हुई आदिम
बरसात, टूट जाते हैं
शीशे के सभी
दीवार, रोके
रुकते
नहीं
विक्षिप्त अभिलाषित जलधार, पृथ्वी और आकाश जब एकाकार । सब
कुछ बह जाता है क्षण में हम
देखते रह जाते हैं अवाक,
उन निःशब्द पलों में
जीवन पा जाता
है आत्म सुख
अपरम्पार,
इस
असीम डूब में निहित है सारा संसार,
पृथ्वी और आकाश जब
एकाकार ।
-- शांतनु सान्याल

26 जुलाई, 2026

अनंत प्यास - -

मुँडेर से उतरती धूप की तरह क्रमशः

सभी संपर्क के बेल बूटे फ़िके हो
गए, फिर भी आसान नहीं
होता पुराने कपड़ों को
फेंक देना, यूँ लगे
बरसों से तन
में लगते
लगते
अंतिम पलों तक हम किसी के हो गए, 
मुँडेर से उतरती धूप की
तरह क्रमशः सभी संपर्क के
बेल बूटे फ़िके हो गए ।
मायावी तंतुओं
में गुथी
रहती है दीर्घ जीने की अदम्य चाहत,
पुरातन जीर्ण शीर्ण पोशाक को
बार बार छु कर देखने की
अभिलाषा, पुनरपि
जननं पुनरपि
मरणम्:  ये
जान कर
भी मिटती नहीं अनंत तियासा, दुःख
सुख के स्रोत मुहाने में एक सरीखे
हो गए, मुँडेर से उतरती धूप
की तरह क्रमशः सभी
संपर्क के बेल बूटे
फ़िके हो
गए ।
- शांतनु सान्याल

15 जुलाई, 2026

पारदर्शी पुल - -

कुछ और ही था हृदयस्थ हमारे कुछ और

ही तुम ने सोचा अभिप्राय, पारदर्शी
पुल के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय, कुछ
और ही थी जीवन
की रेशम सी
अभिलाषा,
तितली
के पंखों में आंकी थी कभी सप्तरंगी आशा,
समुद्र सैकत में बिखरे पड़े हैं अब कुछ
मृत सीप निरुपाय,पारदर्शी पुल
के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय ।
न जाने कितने
रेत के घर
ढह
जाते हैं लहरों को उसकी ख़बर नहीं होती,
जी उठते हैं फिर भी आदिम जीवाश्म
सभी सुबह की दस्तक से, इस
रात की कोई अंतिम डगर
नहीं होती, गुज़र जाते
हैं उजालों के
काफ़िलें
तकता
रह
जाता है शून्य आँखों से जीवन सराय, पारदर्शी पुल के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय ।
- -शांतनु सान्याल

03 जुलाई, 2026

बहाव - -


ज़िन्दगी और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह जाता है
आख़िर में सुनसान
रास्ते के सिवा
कुछ भी
नहीं
होता, सूख जाते हैं सभी सजल
एहसास, वक़्त भर जाता
है ख़ालीपन का सुरंग,
कारवां बढ़ जाता
है बहोत आगे
सितारों
के हमराह, तन्हा मुसाफ़िर बहोत
पीछे रह जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह
जाता है ।
वो
तमाम हसरतें रहती हैं संदूक के
अन्दर बंद कोरे कपड़ों की
तरह, पहुँचने से पहले
ही उठ जाता है जश्न
ए उजाला, फिर
भी जीने की
आस ले
जाती
है हमें सुबह के मुहाने तक, एक
नए दिन का आगाज़ ख़ामोश
हो कर भी बहुत कुछ कह
जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के
दरमियाँ
बहोत
कुछ बह जाता है - - - - - - -
- - शांतनु सान्याल


10 जून, 2026

पुनर्विन्यास - -

रेल पटरियों के उस पार बिखरी

पड़ी हैं टुकड़ों में दोपहर की
धूप, कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस,
अंतिम
रेलगाड़ी के गुज़रते ही सुनाई देती है एक अजीब सी दबी आहट,
सीने से उतर कर रूह की
गहराइयों तक सूखे
पत्तों की हो जैसे
सरसराहट,
महुआ
फूल
की तरह हम बीनते हैं टूटे सपनों
को, करते हैं सुबह से पहले
जीवन का पुनर्विन्यास,
कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस ।
चाँदनी
का स्पर्श था या छू कर आए हम रंगीन तितलियों के पर, न
जाने कौन रख गया
कुछ शिशिर बिंदु
पलकों के
ऊपर,
यद्यपि हाथों से छूट कर लुढ़क गया कोई अनमोल पत्थर,
दूर तक बिखरे पड़े हैं
गुलमोहर, फिर
आज हमें
हो चला
है पुनः जीने का एहसास, कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस ।
- - शांतनु सान्याल


08 जून, 2026

महफ़िल बर्खाश्त - -


झील की गहराई में आकाश डूबा सा लगे, लौट कर उसे हम ने

देखा है कई बार, ज़िन्दगी
कुछ नहीं एक अंधा
कुआं सा लगे,
न जाने
किस
तरह की हैं ये अस्पष्ट प्रतिध्वनियां,
दूर तक सिर्फ़ धुआं धुआं सा
लगे, ज़िन्दगी कुछ नहीं
एक अंधा कुआं सा
लगे । उम्र भर
आईने से
रही
दोस्ती, फिर भी दिल की बात दिल में ही रही, मेरा अक्स न जाने क्यूं आज बेजुबां सा लगे, ज़िन्दगी
कुछ नहीं एक अंधा कुआं
सा लगे । अंधेरे उजालों
की मिल्कियत अब
सहेज कर क्या
रखें, बस
रात
ढलने वाली है, वक़्त ओझल होता
कोई कारवां सा लगे, ज़िन्दगी
कुछ नहीं एक अंधा
कुआं सा लगे ।
- - शांतनु सान्याल 

01 जून, 2026

लाक्षागृह - -

कहीं भी रहो शीशमहल हो या कोई अज्ञातवास, समय हर

हाल में ले के रहेगा स्व
कर्मों का पाई पाई
हिसाब, मिलता
नहीं किसी
को
जतुगृह* से निकास, यूँ तो कहने
को वो शख़्स था सारी दुनिया
का पुरोधा, जिस ने अपने
स्वार्थ के लिए आम
जनता को उल्टा
पुल्टा जैसा
चाहा
वैसा साधा, वक़्त का फेर देखो वही महाबलि आज अपने
कांधे पर लिए फिर
रहा है अपनों
की लाश,
मिलता
नहीं
किसी को जतुगृह से निकास ।
जिस की तस्वीर लगी रहती
थी शहर के हर एक गलि
कूचों में, वही आज
चेहरा छुपाए
बैठा है
गुमनाम दरीचों में, शून्य बटा सन्नाटा है सिर्फ उसके
आसपास, मिलता
नहीं किसी
को
जतुगृह से निकास ।
- - शांतनु सान्याल 
*  संस्कृत शब्द -   लाक्षागृह  का पर्यायवाची

17 मई, 2026

मातृ रूपेण संस्थिता - -

विभेद नहीं करता कभी मातृस्तन,

फिर भी हम छोड़ नहीं पाते
विष दंशन,जो वृक्ष देता
है जीवन दान वही
एक दिन होता
है बलिदान,
काश हम
इस
देश की माटी में देख पाते हृदय
स्पंदन, विभेद नहीं करता
कभी मातृस्तन । तुम
आज भी तलाश
करते हो
परकीय
मिट्टी
में
अपना ईश, जबकि तुम्हारा सारा
अस्तित्व है इसी देश के बीच,
इसी धरातल के गर्भ में
बिखरना है हम सब
को एक दिन,
इसी धूल
में है
समाहित स्वाधीनता का रक्त चंदन,
इस माटी से बढ़ कर नहीं
कोई जीवन मरण
का अटूट
बंधन,
विभेद नहीं करता कभी मातृस्तन ।
- - शांतनु सान्याल

14 मई, 2026

प्रतिच्छाया - -

यूँ तो मेरे पास अपना कुछ भी नहीं, आजन्म निःस्वता ही

है मेरी पहचान, फिर
भी वो कहते हैं
मेरे पास
है अंतहीन सपनों की ज़मीन
और एक मुट्ठी भर
आसमान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान ।
यूँ तो मेरा अपना नहीं
कोई स्थायी निवास,
न कोई पता -
ठिकाना,
एक
अंतहीन अन्तर्यात्रा, न कोई सीमा
न कंटक तार, देह से हो कर
प्राण प्रदेश अनवरत
आत्म उड़ान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान । यूँ तो
तो भीड़ में गुम हूँ फिर भी वो
कहते हैं उनके दिल के
क़रीब हूँ, आईने से
डर लगता है
फिर भी
देखता हूँ ख़ुद को उलंग, कोहरे के स्नानागार में, बस इसी एक
बिंदु पर आकर हो जाता
है सभी मोह का महा
अवसान, आजन्म
निःस्वता ही है
मेरी पहचान ।
- - शांतनु सान्याल

13 मई, 2026

अग्नि बीज - -

यहाँ नगर संकीर्तन है यथावत  अष्टप्रहर, तथापि बाती

स्तम्भ समझ नहीं
पाते अंतर्तम
का अंध
स्वर,
इस द्वार पर सूर्य नहीं उगता ले कर नया ख़बर, फिर भी एक नारी
अपने अंचल में बोती है
अग्नि बीज, इस गाँव
का बूढ़ा बरगद
शाम ढले
लेता
है दीर्घ निःस्वास, फिर भी एक क्लांत युवा नर संवारता है
टूटा हुआ नीड़, अपनों
को सहेजता है
अपने
वक्षःस्थल के आसपास,जो लोग
दख़ल करते हैं नीलाकाश
उनके पास होती है केवल
सामयिक मियाद,
सूर्य को हर
हाल में
निकलना है तोड़ के तमाम मेघ
प्रतिरोध, महल, चौबारा,
दाम्भिक पिटारा सब
कुछ बिखर जाता
है पल में जब
जागृत हों
समवेत
कंठ
स्वर, यहाँ नगर संकीर्तन है यथावत अष्टप्रहर ।
- - शांतनु सान्याल

11 मई, 2026

अकस्मात कभी - -

ईशान कोण के उस पार है कहीं

तुम्हारा ठिकाना, ज़िन्दगी
इधर है बस एक सूखी
नदी, रेत पत्थरों के
बीच खोए स्रोत
को तलाशती
हुई, हो
सके
कभी तो अनायास ही बरस जाना, ईशान कोण के
उस पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना । अभी बहुत दूर है मुहाने का प्रकाश स्तंभ,
पहाड़, तलहटी, ग्राम
शहर, पुरातन
मंदिर,
उदास से खड़े हैं दोनों पार असंख्य आशातीत 
खंडहर, तृषित
अधरों को
हे मेघ
कभी तो सजलता दिलाना, ईशान कोण के उस
पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना, अनाहूत सांझ वृष्टि की तरह अंतरतम तक कभी
हो सके तो बिखर
जाना ।
- - शांतनु सान्याल
  

01 मई, 2026

असमाप्त इंतज़ार - -

सिमटते जलस्रोत के नीचे जमी हुई है काई,
समय के सतह पर तैरती सी लगे है परछाई,

तट के ऊँचे ऊँचे दरख़्त किस काम के भला,
दे न सके ज़रा सी राहत कहने को अगुआई,

आज भी है जारी रेत के नीचे जल की खोज,
कई दशक गुज़रे लेकिन हालत न सुधर पाई,

झर चुके महुआ पलाश, प्राण में अधूरी प्यास,
ज़रा कोई बताए जीने की ख़बर कहाँ से आई,

चाँदनी है बेअसर ग़र जिस्म हो तपता बियाबाँ,
यहाँ छत नहीं मयस्सर वहां ताजमहल बनवाई,

सभी हैं मुन्तज़िर, उस ख़ुशनुमा सुबह के लिए,
उम्र गुज़री राह तकते लेकिन कुछ ख़बर न आई,
- - शांतनु सान्याल


26 अप्रैल, 2026

तिमिर स्नान - -

सारे महानगर में है एक अजीब सा रंग मशालों का उद् घाटन,

राजपथ के दोनों तरफ हैं
खड़े मंत्रमुग्ध से सहस्त्र
जनगण, गुजरेगा
कुछ ही देर
में राजन
का
स्वर्णिम रथ पुनः बिखर जाएंगे
सभी मायावी स्वप्न, निःशब्द
सीलन भरे दीवारों के
मध्य यथावत अंध
अवगाहन, सारे
महानगर में
है एक
अजीब सा रंग मशालों का उद् घाटन । रहस्यमयी निशीथ - देती है दस्तक, कदाचित
लौट आया हो बरसों
का पलातक, पुनः
यशोधरा है
श्रृंगार
रत,
सारे देह में लपेटे स्वप्न भष्म वो
चाहती है अरण्य गमन, भोर
से पहले गहन निमज्जन,
सारे महानगर में है
एक अजीब
सा रंग
मशालों का उद् घाटन ।
- - शांतनु सान्याल 

22 अप्रैल, 2026

अपनी शर्तों के तहत - -

मेरी कविताओं का शीर्षक कुछ भी हो

लेकिन वो जीती हैं अपनी ही शर्तों
के तहत, मेरे जीवन का गंतव्य
अज्ञात सही, बियाबान से
लेकर समंदर तक मुझे
तलाश है एक अदद
सुकून की अपने
अंदर तक,
अपनी
ही शर्तों के तहत । मेरे शब्दों का विस्तार
हो अनंत आकाश से गहन सागर
के हृदय तक, ख़ानाबदोशों
की तरह उन्मुक्त हों
तोड़ के सभी
स्वर व्यंजन
की जटिलताएं, मेरी भावनाओं को मिलें
अशेष उड़ान, अंतर्तम में समा जाएं
प्रलयंकारी बवंडर तक, हों सब
कुछ उद्भासित, आडम्बर से
नग्न सत्य के खंडहर
तक, अपनी ही
शर्तों के
तहत ।
- - शांतनु सान्याल

08 अप्रैल, 2026

छायानृत्य - -

अलौकिक रंगमंच पर है मंचित छायानृत्य,

उल्लसित दर्शकों के मध्य है प्रसारित
मायावी अंधकार, हर एक हाथ
छूना चाहे देह का बालूमय
टापू, सिमटता जाए
उम्र का ढलता
किनार, इस
रात के
सीने पर है पुनः लज्जित अंतरतम का
सत्य, अलौकिक रंगमंच पर है
मंचित छायानृत्य । युगों
का थमा हुआ
अट्टहास,
पुनः
हो चला है जागृत, पुनर्जन्म के संधान में
चल पड़े हैं अभिशापित सभी जीवित
या मृत, अनंत पथ के वो यात्री
पाना चाहे इसी धरा पर
सूत्र अमर्त्य, अलौकिक
रंगमंच पर है मंचित
छायानृत्य ।
- - शांतनु सान्याल

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