उतर आई है रात सधे
पांव तलहटी के
झुरमुट में,
गहरा
चली
सी
है ज़िन्दगी ख़ूबसूरत से
आहट में, एक दूजे
में हो विलीन
बह चले
हैं
आकाश पथ में, एक
अद्भुत अनुभूति है,
अंतरिक्ष के
सरसराहट
में, ग्रह
नक्षत्र,
समुद्र, पृथ्वी सब लग
रहे हैं दिव्य बिंदु,
उल्लसित हैं
देह प्राण
प्रणयी
मेघ
के गड़गड़ाहट में, झिर
झिर झर रहे हैं, निशि
पुष्प के सुगंध बूंद
बूंद, छू लिया
हम ने
आकाशगंगा को यूँ ही
घबराहट में।
* *
- - शांतनु सान्याल

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 21जून 2023 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपका हृदय तल से आभार ।
हटाएंजी बहुत उम्दा लेखनी ।
जवाब देंहटाएंआपका हृदय तल से आभार ।
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