Sunday, 6 April 2014

गुमनाम वजूद - -

वो काग़ज़ के फूल थे या कोई 
फ़रेब ए नज़र, उसकी 
हर बात पे यक़ीं
था लाज़िम, 
हमने 
बेफ़िक्र हो, ज़िन्दगी उसके -
नाम कर दी, यूँ तो सफ़र 
में फूलों से लदी,
वादियों की 
कमी न 
थी, फिर भी हमने, न जाने 
क्यूँ उसकी चाहत में,
काँटों के साए,
उम्र यूँ 
ही तमाम कर दी, ये सच है 
कहीं न कहीं, उसकी 
मुहोब्बत में थी 
ख़ुश्बू ए 
वफ़ा 
की ज़रा सी कमी, महसूस -
करने की ख्वाहिश में 
उसे, मुक्कमल 
वजूद 
अपना यूँही गुमनाम कर दी,

* * 
- शांतनु सान्याल 





http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
beauty of daisy

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (07-03-2014) को "बेफ़िक्र हो, ज़िन्दगी उसके - नाम कर दी" (चर्चा मंच-1575) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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