Sunday, 6 April 2014

गुमनाम वजूद - -

वो काग़ज़ के फूल थे या कोई 
फ़रेब ए नज़र, उसकी 
हर बात पे यक़ीं
था लाज़िम, 
हमने 
बेफ़िक्र हो, ज़िन्दगी उसके -
नाम कर दी, यूँ तो सफ़र 
में फूलों से लदी,
वादियों की 
कमी न 
थी, फिर भी हमने, न जाने 
क्यूँ उसकी चाहत में,
काँटों के साए,
उम्र यूँ 
ही तमाम कर दी, ये सच है 
कहीं न कहीं, उसकी 
मुहोब्बत में थी 
ख़ुश्बू ए 
वफ़ा 
की ज़रा सी कमी, महसूस -
करने की ख्वाहिश में 
उसे, मुक्कमल 
वजूद 
अपना यूँही गुमनाम कर दी,

* * 
- शांतनु सान्याल 





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