Saturday, 15 February 2014

ले चल फिर मुझे इक बार - -

ले चल फिर मुझे इक बार उन्हीं 
ख्वाब उनींदी राहों में कहीं, 
है बोझिल जिस्म ओ 
जां, कि साँस 
भी है 
कुछ मद्धम सा, ले चल कहीं - - 
दूर, ज़माने के तमाम 
वो कँटीली रस्म 
ओ रिवाज 
के बर 
अक्स, किसी उन्मुक्त आसमां -
के तले, जहाँ बिखरती हो 
चाँदनी अबाध नदी 
की तरह, 
भिगोती है जहाँ शबनम की बूंदें, 
रात ढले, रूह की तिश्नगी 
लम्हा लम्हा, जहाँ 
दग्ध जीवन 
पाए -
इक नवीन उच्छ्वास, हो मुझे -
फिर दोबारा तेरे बेइंतहा 
इश्क़ का अंतहीन 
अहसास।

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
song bird