Saturday, 22 October 2011


मृगजल 
तुम चाहे जितना भी चाहने का दम भरो,
मरने मिटने की क़सम खाओ,
सरीसृप से विहग बन न 
पाओगे,  ये अंतर्मन 
की बात है,
रंगीन शल्कों से चाहे जितना भी ढक लो तन 
अपना, वो नैसर्गिक आभा ला न 
पाओगे, छद्म आवरण से 
मुक्ति न पा सकोगे,  
 मुझे पाने की तुम्हारी चाहतें रुक जाती हैं 
मांस पेशियों, रक्त कणिकाओं तक 
आ कर, वृष्टि छाया के उस पार 
बहती है शुष्क अतृप्त नदी 
कोई, ह्रदय तंतुओं में 
बसते हैं, 
पलाश वन लिए शताब्दियों के प्रज्वलन 
 तुम चाहे अनचाहे अनंत मेघ 
बन बरस न पाओगे, थक 
हार के एक दिन, प्रति -
ध्वनि के पथ हो 
निशब्द, सुदूर शून्य में लौट जाओगे, चाह कर 
मुझे अपना न पाओगे, तृषित थे यूँ  भी 
युगों युगों से, मृगतृष्णा में पुनः 
खो जाओगे, लाख कोशिश 
करो लेकिन मुझसे न 
कभी मिल 
पाओगे, 
-- शांतनु सान्याल  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/