जुनून ए सफ़र का है मुसाफ़िर,
तो मुस्तक़िल ठिकाना
कैसा, इक रात
का है
मजलिस ए हंगामा, गहरा
दिल लगाना कैसा।
उतर जाएंगे
सभी नूर
ए दरिया, ओ जुनूनी मौज
रफ़्ता रफ़्ता, वही दूर
तक धुंध की
दुनिया,
रमते जोगी का घर बसाना
कैसा। इस किनारे से
उस किनारे तक,
झूलता सा
है कोई
जादुई पुल, दरख़्त ए
काफ़ूर है ज़िन्दगी,
अंगारों से
आख़िर
घबराना कैसा। दास्तां ए
मजमु'आ अपनी
जगह, अब
भी हैं
दोनों हाथ ख़ाली,जब कूच
को है तारों का कारवां,
हक़ीक़ी क्या,
अफ़साना
कैसा।
* *
- - शांतनु सान्याल

सादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26-7-21) को "औरतें सपने देख रही हैं"(चर्चा अंक- 4137) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
--
कामिनी सिन्हा
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंकृपया २६ की जगह २७ पढ़े
जवाब देंहटाएंकल थोड़ी व्यस्तता है इसलिए आमंत्रण एक दिन पहले ही भेज रही हूँ।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबेहतरीन शायरी !!
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत उम्दा
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंजादुई पुल, दरख़्त ए
जवाब देंहटाएंकाफ़ूर है ज़िन्दगी,
अंगारों से
आख़िर
घबराना कैसा।
बहुत ही बेहतरीन
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंदोनों हाथ ख़ाली,जब कूच
जवाब देंहटाएंको है तारों का कारवां,
हक़ीक़ी क्या,
अफ़साना
कैसा। ..बहुत सही
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंवाह। बहुत खूब । हर पंक्ति लाजवाब। सादर।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंआदरणीय, दोनों हाथ ख़ाली,जब कूच
जवाब देंहटाएंको है तारों का कारवां,
हक़ीक़ी क्या,
अफ़साना
कैसा।
सारगर्भित रचना!--ब्रजेंद्रनाथ
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंखूबसूरत पंक्तियाँ।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत ही सुंदर, सत्य को उजागर करती हुई रचना
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत ख़ूब शांतनु सान्याल जी,
जवाब देंहटाएंनज़ीर अकबराबादी की नज़्म याद आ गयी -
सब ठाठ पड़ा रह जाएगा,
जब लाद चलेगा बंजारा !
सुना है कि सिक़न्दरे-आज़म भी ख़ाली हाथ ही गया था.
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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