Wednesday, 19 March 2014

उजली रातों की त्रासदी - -

ज़रूरत से ज़ियादा उम्मीद न कर 
जाए तुम्हें परेशां, रहने दे 
मुझे यूँ ही गुमनाम 
गलियों में 
कहीं, 
न बना जाए तुम्हें, इश्क़ जानलेवा 
उजली रातों की त्रासदी, वो 
ख्वाब जिसकी उम्र हो 
मुख़्तसर, न 
दिखा 
मुझको ख्यालों की ज़िन्दगी, कहीं 
छलक न जाएँ मेरी ख़मोश 
निगाहें, न दे मुझे 
इतनी ख़ुशी,
बहोत 
कठिन है राह आतिश से गुज़रना
ऐ  मेरे हमनशीं  - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 



http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art Letní kytice s chrpami_pastel

2 comments:

  1. जरुरत से ज्यादा की उम्मीद न कर..,
    रहने दे गैर हाल मुझे ताकीद न कर..,
    कही बन जाए न ये इश्क जान लेवा..,
    खुबरुई छोड़ दे मिरी नज़रों की बसर.....

    ReplyDelete

अतीत के पृष्ठों से - -