गुरुवार, 14 नवंबर 2013

न करना मुकम्मल यक़ीं - -

चलो तोड़ दिया हमने भी अहद क़दीमी,
कब तक कोई जीए, यूँ सीने में
समेटे अहसास ज़िन्दान,
तुम्हारा वजूद चाहे
इक मुश्त खुली
हवा !
फिर फ़िज़ाओं में है दस्तक बाद ए सुबह
की, तुम्हें हक़ है बेशक, परवाज़ -
वादी, चलो हमने भी खोल
दिया सीने के सभी
दरवाज़े क़फ़स,
बुलाती हैं
फिर तुम्हें, फूलों से लबरेज़ गलियां, न -
भूलना लेकिन, मेरे दिल का वो
दाइमी पता, बहुत मुश्किल
होगी अगर भटक
जाओ राह
चलते, हरगिज़ मौसम पे मेरी जां, न - -
करना मुकम्मल यक़ीं, न जाने
किस मोड़ पे दे  जाए, इक
ख़ूबसूरत धोका - -

* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
Realistic paintings of Russian painter Vladimir Maksanov

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (16-11-2013) "जीवन नहीं मरा करता है" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1431” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  2. भावो का सुन्दर समायोजन......

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  3. हर पल बदलती दुनिया----ना करना मुक्कमल यकीं,किस मोड पर दे जांय इक खूबसूरत धोका,
    खूबसूरत बन पडीं दिल की बातें

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  4. मौसम पे न करना मुकम्मल यकीं ,
    ना जाने किस मोड पर दे जाए एक खूबसूरत धोका।
    बहुत सुंदर।

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  5. सभी आदरणीय मित्रों को असंख्य धन्यवाद - - नमन सह.

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  6. भावपूर्ण रचना बहुत बधाई आपको ।

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  7. सभी आदरणीय मित्रों को असंख्य धन्यवाद - - नमन सह.

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