Sunday, 7 April 2013

जिस्म ओ जां के परे - -

तक़ाज़े उनके तस्सवुर के परे, ज़िन्दगी 
के किनारे सिमटते हुए, चाहत 
के धारे बेलगाम, वजूद
का बचना बहोत 
मुश्किल,
हर फ़सील पे दहकते जुनूं, हर मोड़ पे 
हैं चमकते ख़्वाबों के जुगनू, 
कहाँ से लाएं संग -
पारस उनकी 
आरज़ू 
ज़रीन कायनात, अपनी हैसियत इक -
ख़ाक ए महक, उनकी ख्वाहिश 
संदली जहान, मुमकिन 
कहाँ ख़यालों का, 
ज़िन्दगी 
में यूँ हुबहु शक्ल में ढलना, न जाने फिर
भी क्यूँ दिल चाहता है तुम्हें 
ज़िन्दगी से ज़ियादा 
फ़राहम करना,
जिस्म ओ 
जां 
के परे रूह तक निसार करना - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
ज़रीन - सुनहरी 
drops - - no idea about painter