Friday, 12 April 2013

पैकर कहकशां !

अंजुमन ए नजूम में था रात भर, इक मुबाहसा 
बेइन्तहा, के ज़मीं पे नज़र आता है कोई 
पैकर कहकशां ! मोज़ूअ बहस 
रुक सी जाती है अक्सर 
आ कर उनकी 
आँखों में 
बारहा, हसूद दिल चाहता है मुक्कमल फ़तह - - 
खुला आसमां ! इक संदली ख़ुशबू सा है, 
तारी तहे ज़मीर, ज़िन्दगी फिर 
चाहती है तेरे इश्क़ में, बूंद 
बूंद कामिल शबनम 
की मानिंद, 
फूलों पे 
बग़ैर शर्त अन्दर तक लबरेज़ जज़्ब हो जाना !
* * 
- शांतनु सान्याल 
अंजुमन ए नजूम - सितारों का समूह 
मुबाहसा - बहस 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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