तृण शीर्ष पर कुछ ओस बूंद, देते
हैं आख़री सहारा झरते हुए
पारिजात को, दूरत्व
तो होता है बस
एक बहाना,
हर कोई
चाहता है ज़िन्दगी को नए सिरे से
सजाना, मीठी सी धूप ग़र
पसरी पड़ी हो अहाते
में दूर तक, कौन
याद रखता
है लौटी
हुई
बरसात को, तृण शीर्ष पर कुछ ओस
बूंद, देते हैं आख़री सहारा झरते
हुए पारिजात को। सुदूर
क्षितिज की ओर एक
सूखी सी नदी जा
मिलती है
किसी
अनाम मरु देश में, किनारे पर खड़े हैं
प्रागैतिहासिक पल्लव विहीन
वृक्ष साधुओं के वेश में,
पद चिन्हों के
जीवाश्म
भूल
चुके हैं सदियों पुरानी याद को, तृण
शीर्ष पर कुछ ओस बूंद, देते
हैं आख़री सहारा झरते
हुए पारिजात
को।
* *
- - शांतनु सान्याल

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 30 सितम्बर 2021 शाम 3.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार नमन सह।
हटाएंमीठी सी धूप ग़र
जवाब देंहटाएंपसरी पड़ी हो अहाते
में दूर तक, कौन
याद रखता
है लौटी
हुई
बरसात को
–सत्य कथन
उम्दा भावाभिव्यक्ति
ह्रदय तल से आभार नमन सह।
हटाएंआपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-10-2021) को चर्चा मंच "जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा" (चर्चा अंक-4204) पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
जवाब देंहटाएं--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
ह्रदय तल से आभार नमन सह।
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