कैसे छोड़ दूँ सपनों के पीछे दौड़ना, अंदर
का रिले रेस, हर हाल में चाहता है,
तुम तक पहुंचना, मैंने बांध
ली है, ज़ख्मों के ऊपर
स्मृति रुमाल,
हाथों में हैं
कुछ
रंगीन पताका, हर एक जनम में लेकिन
तुम उसी दिगंत बिंदु पर रुकना,
अंदर का रिले रेस, हर हाल
में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। कुछ
तितलियों
के मृदु
स्पर्श, कुछ सुबह की कच्ची धूप, कुछ
रंगीन पेंसिलों के उपहार, कहानियों
की किताब, कुछ मुस्कान भरे
उम्मीदों का हाथ बदल,
तुम उड़ान पल के
नीचे किसी
मासूम
शिशु
के आसपास कहीं ठहरना, अंदर का रिले
रेस, हर हाल में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। उस कांच की दीवार
के उस पार, बसते हैं कुछ
रेशमी लिबास वाले,
काश, वो भी
जान पाते
ये ख़ुशियों का खेल, भावनाओं का अदल -
बदल, जो बंद है उनकी सोच में कहीं,
वो अक्सर चाहते हैं अन्तःस्थल
से बाहर छलकना, अंदर का
रिले रेस, हर हाल में
चाहता है, तुम
तक
पहुंचना।
* *
- - शांतनु सान्याल

बहुत अच्छी, बहुत सुंदर, मर्मस्पशी काव्य-रचना। अभिनंदन शांतनु जी।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंशीशे की दीवारों में कैद लोगों को खुशियों के महत्व का क्या पता !
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंवाह! संवेदनाओं को जगाती सार्थक रचना।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंसार्थक और भावप्रवण रचना।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत सुंदर दिल को छूने वाली पंक्तियाँ
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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