Monday, 3 March 2014

उन्मुक्त आकाश - -

उस संकुचित परिधि के बाहर  
भी है एक विशाल दुनिया, 
कभी स्वयं से बाहर 
निकल कर 
तो देखें, 
प्रतिबिंबित किरणों का दोष -
कुछ भी न था, अनुकूल 
बीज ही थे अंकुरित
पौधे, प्रकृत -
सत्य 
को झुठलाना नहीं सहज, ये 
उभरती है अदृश्य 
शक्तियों के 
साथ 
अप्रत्याशित रूप से, तमाम -
बही ख़ाते रहे शून्य 
अंत में, टूटते 
तारे को 
को न थाम पाया, वो विस्तीर्ण 
नील आकाश - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 


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