Sunday, 2 March 2014

गहराइयाँ - -

रात की अपनी हैं गहराइयाँ 
फिर भी निगाहों में 
आख़री पहर 
किसी ने 
सजा दी, चुपके से स्वप्नील 
कहानियाँ, निजात न 
मिली उम्र भर दर्द 
ओ ग़म से 
मुझे, 
फिर भी दिल को छूती रहीं -
कहीं न कहीं अनजाने 
इश्क़ की वो हसीं 
परछाइयाँ,
वो दूर हो के भी है, रूह से यूँ 
वाबस्ता, गुल खिले 
बग़ैर महकती 
है मेरी 
तन्हाइयां, रात की अपनी हैं 
गहराइयाँ  - -

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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