ज़िन्दगी की परिभाषा, एक मुसाफ़िरख़ाने से
ज्यादा कुछ भी नहीं, किसे ख़बर, कल
सुबह कौन है आनेवाला, कुछ धूसर
आकृतियों के मध्य हैं मौजूद
कुछ रंगीन उपलब्धियां,
कांच के घरों से है
यूँ तो नदी
बहुत
दूर, फिर भी उसे पाने का ख़्वाब हर हाल में
देखती हैं बहुरंगी मछलियां, कुछ
अनाहूत लोग मिल जाते हैं
अचानक ही, कुछ
अंतरंग चेहरे
खो जाते
हैं धुंध
की वादियों में, हम ढूंढते हैं उन्हें किसी ग़लत
ठिकाने पर, वो कहीं नहीं मिलता, राह
भटका जाता है वही, जो था राह
दिखाने वाला, ज़िन्दगी
की परिभाषा, एक
मुसाफ़िरख़ाने
से ज्यादा
कुछ भी
नहीं, किसे ख़बर, कल सुबह कौन है आनेवाला ।
रात और दिन के दरमियां झूलते हैं कुछ
आतिथ्य क्षण, कुछ निराशाओं
की भीड़, कुछ स्याह, कुछ
शुभ्र वर्ण, हम करते
हैं हर एक पल
का स्वागत,
हर किसी
को है
एक दिन छोड़ना सांसों का पांथशाला, कोई नहीं
इस जग में अनंतकाल तक, अपने संग
ठहराने वाला, ज़िन्दगी की परिभाषा,
एक मुसाफ़िरख़ाने से ज्यादा
कुछ भी नहीं, किसे
ख़बर, कल
सुबह
कौन है आनेवाला - -
* *
- - शांतनु सान्याल
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25 अक्टूबर, 2022
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जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार(२६-१०-२०२२ ) को 'बस,अपने साथ' (चर्चा अंक-४५९२) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंमन उदासीन हो तो ऐसा ही लगता है .
जवाब देंहटाएं
हटाएंअसंख्य आभार आपका, नमन सह ।