यथारीति, गंध बिखेर कर निशि पुष्प
झर गए रात के तृतीय प्रहर में,
उड़ चले हैं जाने कहाँ सभी
रतजगे विहग वृन्द,
हमारे दरमियां
ठहरा हुआ
सा है
निःस्तब्ध, समय का घूमता आईना,
निष्पलक देखता हूँ मैं, तुम्हारी
आँखों में अपना, उभरता
डूबता हुआ प्रतिबिम्ब,
खो रहे हैं न जाने
कितने ही
लहर
अधर तीर के शहर में, यथारीति,
गंध बिखेर कर निशि पुष्प
झर गए रात के तृतीय
प्रहर में। थम गया
है आकाश में
आलोक
पर्व,
डूबने को है बस बिहान का सितारा,
तुम तलाशते हो मेरे बहुत
अंदर तक पहुँच कर
पुरसुकून कोई
मरुद्यान,
मैं भी
खोजता हूँ तुम्हारे दिल में उतर कर
जीवन नदी का किनारा, काश
मिल जाते कुछ पीयूष
बूँद वास्तविकता
के ज़हर में,
यथारीति,
गंध
बिखेर कर निशि पुष्प झर गए रात
के तृतीय प्रहर में।
* *
- - शांतनु सान्याल

जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२०-०९-२०२१) को
'हिन्दी पखवाड़ा'(चर्चा अंक-४१९३) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
वाह क्या शब्द चयन है। शानदार।
जवाब देंहटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना सर।
जवाब देंहटाएंप्रणम
सादर।
सुंदर रचना
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