Monday, 15 November 2010

नदी


वो एक पहाड़ी नदी, छोटीसी नन्ही सी
उथली और पत्थरों से भरी
सहमी-सहमी, तन्हा तन्हा
किसी दर्द भरी टीसकी मानिंद
खुद को समेटे जैसेबहती हो
आहिस्ता आहिस्ता टूटे पुल के नीचे
मंजिल के जानिब सिमटी सिमटी
सावन में अँधेरा बादिलों का डराए उसे
कभी इस किनारे कभी उस तट
मुसलसल टूटती, बिखरती, संवरती
बहती जाती, ऊँचे दरख़्त सायादार
उसे ढकते, बेलें छूने को बेक़रार
झरने, नाले जिस्म को चूर करते
पहाड़ों का घूरना लगे कौफनाक
लगे जैसे उसका वजूद ये तोड़ डालेंगे
लेकिन वो नहीं रूकती, बहती जाती
अपने आप में खोई खोई, गुमसुम गुमसुम
कभी जागी कभी जैसे सोई सोई
सीने में लिए बेजुबानअफसाने
अनकही बातें, राज़ की गहराइयाँ
नदी तो सिर्फ बहती जाती, रात दिन
गिरह में बांधे अपने जज़्बात
किसी हसीं आँखों से गिरतीं हों जैसे बूँदें
थम थम कर, रुक रुक कर ----
-- शांतनु सान्याल