07 जनवरी, 2024

ओस की बूंदें - -

रूह को शिफ़ा मिले दर्द ओ अलम दवा बन जाए,
अक्स आईने से तो निकले ख़ुद रहनुमा बन जाए,

जीस्त महदूद न हो सिर्फ़ एक नुक़्ता ए नज़र तक,
घुटन भरे जज़्बात खुल कर बाद ए सबा बन जाए,

उम्र ख़त्म नहीं होती निगाह से दिल तक पहुंच कर,
 इश्क़ जुनूं न हो इतनी कि ज़िन्दगी क़ज़ा बन जाए,

क्यूं महफ़िल पूछती है मुझसे आवारगी के वजूहात
कुछ देर रहे तब्बसुम, क़ब्ल इसके बेवफ़ा बन जाए,

पलकों पे जमी हुई हैं कुछ महकती बूंदों की लड़ियाँ,
सांसों की छुअन से मुहोब्बत क़तरा ए नदा बन जाए,
- - शांतनु सान्याल




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