मंगलवार, 4 मई 2021

सूखी ज़मीन के अंदर - -

दूर तक है विस्तीर्ण बालूमय किनारा,
सूखी नदी के मोड़ पर कहीं आज
भी बहती है कोई लुप्त धारा,
कुछ स्मृतियां कदाचित
हों पुनर्जीवित, कुछ
जीवाश्म सुख
पुनः हों
सत्य
में परिवर्तित, फिर बसाएं विध्वस्त -
सपनों का संसार, करें श्रावणी
हवाओं का आवाहन, तप्त
हृदयों को दें उम्मीद
का सहारा, सूखी
नदी के मोड़
पर कहीं
आज
भी बहती है कोई लुप्त धारा। सिर्फ़ -
तुम ही नहीं हो यहाँ नियति के
शिकार, जीवन पथ में है
कभी अप्रत्याशित
विजय, और
कभी
अनचाही हार, अभी तक है मौजूद -
कोई अदृश्य सेतु हमारे दरमियां,
नश्वर जगत हो कर भी
बहुत कुछ कहता
है वो नीला
आसमां,
सब
कुछ लूटा के भी जीवन नहीं होता
है सर्वहारा, न टूट पाए कभी
उम्मीद का डोर हमारा,
सूखी नदी के मोड़
पर कहीं आज
भी बहती
है कोई
लुप्त धारा।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
  

1 टिप्पणी:

  1. आज
    भी बहती है कोई लुप्त धारा। सिर्फ़ -
    तुम ही नहीं हो यहाँ नियति के
    शिकार, जीवन पथ में है
    कभी अप्रत्याशित
    विजय, और
    कभी
    अनचाही हार, अभी तक है मौजूद---गहरी रचना...।

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