जातिस्मर की तरह खोजता हूँ वो अलौकिक द्वार, जहाँ विगत जीवन का था कभी
प्रसारित कारोबार, वो तमाम
पाप - पुण्य का हिसाब,
सत्य - मिथ्या का
पुनरावलोकन,
जानना
चाहता हूँ मृत्यु पूर्व के रहस्य, एक अंतहीन
यात्रा पूर्व जन्म के उस पार, जातिस्मर
की तरह खोजता हूँ वो अलौकिक
द्वार । भाग्यांश में कहीं आज
भी पीछा करते हैं पिछले
जनम के अभिशाप,
या हम जीते हैं
सीने में
लिए हुए अर्थहीन संताप, भटकते हैं आदि
मानव की तरह गुह कन्दराओं में
बेवजह, स्वनिर्मित अंधकार
में तलाशते हैं अंतरतम
की अखंड ज्योति,
दरअसल एक
असमाप्त
मायावी
स्वप्न
ख़ुद से बाहर हमें निकलने नहीं देता, लौट
आते हैं उसी जगह जातिस्मर की
तरह बारम्बार, जातिस्मर की
तरह खोजता हूँ
वो अलौकिक
द्वार ।
- - शांतनु सान्याल
सुन्दर
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