बेतहाशा भटकता रहा परिपूर्णता
की तलाश में, मुद्दतों वोरहता रहा मेरे ही
घर के बहोत
पास में,
कुछ
ख़्वाब पड़े रहते हैं फुटपाथ में
सिगरेट बट की तरह,
अर्धनिशा जागती
है न जाने
किस
मिथ्या विश्वास में, आधे अधूरे
का अंकगणित ज़िन्दगी
भर चलता ही रहा,
कभी इस
करवट
कभी
उस,अक्सर रात गुज़रती है अर्ध
निःश्वास में, सिलवटों की
तरह ख़ुद को संवारने
के सिवा हासिल
कुछ भी
नहीं,
उम्र गुज़रती है आधी किताब की
तरह फिर कभी पढ़ने की
आस में, इस अधूरेपन
में कहीं हम ढूंढते
हैं जीने की
वजह,
कुछ
मौन मुस्कुराहटें, कुछ अर्धक
सवांद, बहोत ज़रूरी हैं
जीवन प्रवास में,
बेतहाशा
भटकता रहा परिपूर्णता की तलाश
में, मुद्दतों वो रहता रहा मेरे ही
घर के बहोत
पास में ।
- - शांतनु सान्याल
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