31 अगस्त, 2025

विलुप्त पल - -

उन्हें ज्ञात है अब मुमकिन नहीं मेरी वापसी,

फिर भी वो बुलाते हैं निरंतर, जब मेघ
घिर आए ईशान कोण में, ऊंची
ऊंची बिल्डिंगों के दरमियान
जब बिजली कौंधती
है आधी रात, एक
झनझनाहट के
साथ जब
हिलती
है बालकनी, वो बुलाते हैं मुझे सुदूर वनांचल
में, जहां कभी मैं दौड़े जाया करता था
खुले बदन, सभी दुःख दर्द से मुक्त
हो कर बारिश में भीगने के
लिए, काश, वो जान
पाते वेदनामय
अंतर, उन्हें
ज्ञात है
अब मुमकिन नहीं मेरी वापसी, फिर भी वो
बुलाते हैं निरंतर । वो अनाम अरण्य
नदी आज भी आवाज़ देती है
उसी अल्हड़पन से, रह रह
कर उकसाती है खोए
हुए बचपन की
मासूमियत,
वो कच्चे
रास्तों
से बहते हुए मटमैले धारे, जहां आज भी
बह रहे हैं काग़ज़ के नाव, कुछ गुज़रे
हुए पल आज भी तलाशते हैं उसी
जगह राहत भरी छाँव, बहुत
कुछ पाने की चाह में
छूट जाता है वो
छोटा सा
गाँव,
सतह पर उभरते हैं इन्द्रधनु के बिम्ब, एक
महाशून्य रहता है हिय के अभ्यंतर,
उन्हें ज्ञात है अब मुमकिन नहीं
मेरी वापसी, फिर भी वो
बुलाते हैं निरंतर ।
- - शांतनु सान्याल 



2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 1 सितंबर 2025 को लिंक की जाएगी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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