28 जुलाई, 2025

उन्मुक्त सीप - -

सत्तर साल से उठाता रहा सूखे पत्तों का ढेर,

कहीं कोई सुख जीवाश्म मिल जाए देर सबेर,

अंतिम चाह का क्या कीजै नीब टूटने के बाद,
तक़दीर के आगे नहीं चलता कोई भी हेर फेर,

एक अदद हमदर्द की तलाश करते रहे ताउम्र,
एक से छूटे कहीं तो हज़ार वेदनाएं लेते हैं घेर,

बिहान की आस में सीते रहे उम्मीद की चादर,
अपना ढहता ओसारा उगता सूरज ऊंचे मुँडेर,

अपने साध में लगे हैं सभी क्या साधु या स्वांग,
मूक अभिनय के हैं सभी पात्र अपने या हों ग़ैर,
- - शांतनु सान्याल 

27 जुलाई, 2025

जन्म दिन - -

ख़त्म कहाँ होता है स्वयं से खेलने का हुनर,

उम्र गुज़रता रहा रुकता नहीं दिल का सफ़र,

फिर मुँडेर पे कोई शाम ए चिराग जला गया,
हद ए निगाह में फिर खिल उठे हैं गुलमोहर,

न जाने कौन है जो रख गया रंगीन लिफ़ाफ़ा,
अदृश्य ख़ुश्बूओं का पता ढूंढती है मेरी नज़र,

फिर लोगों ने एक मुद्दत के बाद किया है याद,
न जाने किस के दुआओं का है ये गहरा असर,
- - शांतनु सान्याल 

26 जुलाई, 2025

पुनरागमन - -

सृष्टि का बाह्यरूप अभी तक है थमा हुआ,

अंदर अनवरत प्रसारित हैं असंख्य कीट
संसार, शाखा प्रशाखाओं में छुपे हुए
हैं अनगिनत मकड़जाल, अनेक
रंगीन छत्रक उभर आए हैं
धरा के वक्षःस्थल पर,
अदृश्य विषदंत पर
कोई रख गया है
फूलों वाला
रेशमी
रुमाल, शाखा प्रशाखाओं में छुपे हुए हैं - अनगिनत मकड़जाल । शायद तुम
उसे पहचानते नहीं, यूं भी इस
प्रजन्म को इतिकथा पसंद
नहीं, क्षत विक्षत देह ले
कर वो चला जा
रहा है छाया
हीन, कहीं
दूर द्वीप
में, जहाँ प्रकृति निर्भय हो कर बिखेरती
है अपना वरदान, भेदभाव विहीन
एक ऐसी जगह जहाँ देह प्राण
को मिले मुक्ति स्थान, वो
पुनः लौटेगा एक दिन
रचेगा प्रकृत रंगों
से जर्जर सृष्टि
का शापित
भाल,
शाखा प्रशाखाओं में छुपे हुए हैं अनगिनत मकड़जाल ।
- - शांतनु सान्याल




आग़ाज़ ए सफ़र - -

सुरंगों से हो कर गुज़रती है रात, सीने

में फड़फड़ाते हैं इतिहास के पृष्ठ,
अंधेरे उजाले के मध्य खो से
जाते हैं कहीं उम्मीद भरे
स्वाधीन पहर, बहुत
कुछ चाहा था
हमने अग्नि
शपथ
लेने
से पहले, मशाल की लौ में उभरते हैं
शैल चित्र, धूसर शून्यता घेरे हुए,
प्रश्नों के भीड़ में भयभीत सा
छुपा बैठा है कहीं उत्तर -
जीविता का उत्तर,
अंधेरे उजाले
के मध्य
खो से
जाते हैं कहीं उम्मीद भरे स्वाधीन
पहर । परछाई का वादा था
झूठा, हम चलते रहे दूर
तक अज्ञात ही रहा
मरुभूमि का
सीमांत, न
कोई
दरख़्त, न कोई सराय, न दूर तक
एक बूँद की झलक, दरअसल
हम एक ख़्वाब में जन्में थे
और उसी ख़्वाब में एक
दिन खो जाएंगे, जो
पल साथ गुज़ारे
बस वही सच
थे बाक़ी
फ़रेब,
कुछ उम्मीद हैं बहुत ही ज़िद्दी हमें
बारम्बार लौटा लाते हैं नए
उभरते हुए ख़्वाब के
अंदर, एक नए
शुरुआत के
संग फिर
आग़ाज़ ए सफ़र - -
- - शांतनु सान्याल 

24 जुलाई, 2025

परिचयहीन - -

एक सरसरी नज़र से उसने मुझे देखा

और सिरे से नज़रअन्दाज़ कर गया,
दरअसल इस में उस शख़्स का
कोई दोष नहीं, हम अपना
पुरातन धूसर शल्क
अब तक उतार
न पाए, वो
अपना
फ़र्ज़
निभा गया, हम अपना परिचय पत्र
ढूंढते रह गए, बड़ी ख़ूबसूरती
से हमें प्रतिध्वनि विहीन
आवाज़ कर गया,
एक सरसरी
नज़र से
उसने
मुझे देखा और सिरे से नज़रअन्दाज़
कर गया । उस मंच की सीढ़ियां
पहुंचती हैं सरीसृपों के देश
तक, मेरे पृष्ठवंशों को
झुकने की आदत
न थी बस इसी
विरोधभास
ने मुझे
अपने शहर में अजनबी बना दिया,
न कोई अभ्यर्थना, न कोई
मिथ्या स्तुति, आईने ने
वक़्त रहते मुझे
एक अदद
अगले
दर
का परिचयहीन आदमी बना दिया,
मुद्दतों से चाहता रहा कि इस
अमूल्य मिट्टी से यूं ही
जड़वट जुड़ा रहूँ,
बहुत अंदर
तक, वो
न चाह
कर
भी मुझको उम्रदराज़ कर गया, एक
सरसरी नज़र से उसने मुझे देखा
और सिरे से नज़रअन्दाज़
कर गया ।
- - शांतनु सान्याल

23 जुलाई, 2025

निरुत्तर पल - -

सारा शहर है गहरी नींद में, झींगुर ध्वनि

के मध्य झर रही हैं श्रावणी बूंदें,
निस्तब्धता चीरती हुए रात
काँपते हाथों हिलाती है
साँकल, पूछती है
न जाने किस
का पता,
देह
पड़ा रहता है बिस्तर पर निर्जीव काठ सा,
उन अस्फुट शब्दों में ज़िन्दगी खोजती
है मायावी आवाज़ को, उठ कर
छूना चाहती है दहलीज़ से
लौटती हुई एक अनाम
ख़ुश्बू को, रोकना
चाहती है उसे
अपने साँसों
के अंदर,
लेकिन
रात कहाँ रुकती है किसी के रोके, उस
का सफ़र क्षितिज तक रहेगा जारी,
किसी तरह उठ कर कपाट
खोलता हूँ, कहीं कोई
पद चिन्ह ग़र दिखे,
भीगे आँगन में
कुछ सफ़ेद
फूल बिखरे हुए हैं बेतरतीब से, रात अपने
साथ कदाचित सभी ख़्वाब भी समेट
ले गई, दूरस्थ पहाड़ों से उठ रहा
है धुंआ या वाष्प कण, किसे
ख़बर ? कुछ प्रश्न रहते
हैं चिर निरुत्तर ।
- - शांतनु सान्याल

22 जुलाई, 2025

मुलाक़ात हो कभी - -

मर्माहत पतंग की डोर ढूंढती

है अंतिम ठिकाना, उस
दरख़्त के शाख से
कभी हमें भी
मिलवाना ।
अनगिनत वेदना समेटे अटूट
है रूहानी पतवार,भीगे
पंख लिए पखेरू को
गंतव्य तक
पहुंचाना ।
इस रास्ते में नहीं बहती कहीं
कोई आकाश गंगा,पत्थरों
के शहर में है ये शीशे
का घर ज़रूर
आना ।
उजाड़ कर दिल का चमन
हरहाल में हैं मुस्कुराए,
शिकायत किसी से
नहीं बियाबां से
है आना
जाना ।
न जाने किस दुनिया की
ख़्वाबिदा बात करते
हो, बहुत मुश्किल
है हक़ीक़त से
बच के निकल
पाना ।
- - शांतनु सान्याल 

18 जुलाई, 2025

अभी से क्यूं जाएं - -

अमर शब्दांश अधूरा था प्रेम प्रत्यय जुड़ने

से पहले, हज़ार बार मुड़ के देखा किए
गुलमोहरी राह में दूर तक, कहीं
कोई न था अपने साया के
सिवा ख़ुद की तलाश
में निकलने से
पहले, कुछ
भी नहीं
है यहाँ चिरस्थायी, फिर भी हम बुनते हैं
नित नए सपनों के शीशमहल, कितने
अभिलाषों का कोई अभिलेख
नहीं होता, फिर भी हम
लिखते हैं रेत पर
उम्मीद भरी
कविता
सब कुछ बिखरने से पहले, अमर शब्दांश
अधूरा था प्रेम प्रत्यय जुड़ने से पहले ।
इस बात की ख़बर है हम को
अच्छी तरह कि एक दिन
पहुँचना है निःशब्द
नदी किनारे,
अभी से
क्यूं
खोजें प्रस्थान पथ, अभी कुछ दूर और
है चलना हमें बाँह थामे तुम्हारे,
बहुत कुछ देखना समझना
है बाक़ी, कोई अफ़सोस
न रहे दिल में मरने
से पहले, अमर
शब्दांश
अधूरा था प्रेम प्रत्यय जुड़ने से पहले ।
- - शांतनु सान्याल

उजाले की बात - -

जिस जगह में कभी हमने उजाले की

बात की थी उस जगह नदी अंधेरे
में तलाशती है स्मृति मशाल,
वो बूढ़ा बरगद आज भी
है मौजूद कुछ झुका
हुआ कांधे पर
थामे हुए
सारे
जहां का दर्द, खड़ा है अपनी जगह
यथावत, उसकी उलझी जटाएं
कभी थकती नहीं, निरंतर
खोजती हैं सिक्त भूमि,
सब कुछ लुटा कर
भी वो होता नहीं
कंगाल, उस
जगह नदी
अंधेरे
में तलाशती है स्मृति मशाल । जिस
जगह हमने मिल कर लिया था
अग्निस्नान का शपथ उस
जगह आज भग्न
देवालय के
सिवा
कुछ नहीं बाक़ी, बिखरे हुए ईंट पत्थरों
में गुम हैं शिलालेख के वर्णमाला,
उन का मर्म सिर्फ़ नदी जानती
है, उस ने बड़े नज़दीक से
देखा है विपप्लवी
मशालों की
लौ को,
नदी
सब सुनती है, परेशान हो कर देखती
है बढ़ते हुए कंक्रीट के जंगल को,
कल क्या होगा कहना आसान
नहीं, रौद्र रूप डूबा भी
सकता है सारे शहर
को, वैसे अभी
तो शांति है
बहरहाल,
उस
जगह नदी अंधेरे में तलाशती है स्मृति
मशाल ।
- - शांतनु सान्याल 

16 जुलाई, 2025

अदृश्य दहन - -

एक जटिल जाल में गुथा हुआ ये शरीर

चाहता है मुक्त होना किसी मसृण
स्पर्श से, जीवन का सौंदर्य
छुपा रहता है अदृश्य
उष्ण श्वास के
छुअन में,
कांच
के शोकेस में सज्जित पुस्तकों में नहीं
मिलेगी आत्म सुख की परिभाषा,
कुछ एहसास निर्जीव से पड़े
रहते हैं अंधकार पृष्ठों के
अंदर शापित
जीवाश्म
की
तरह, मुक्ति पथ के दोनों दरवाज़ों में
होते हैं अंकित अबूझ प्रेम के
इतिकथा, जिसे सिर्फ़
वही पढ़ सकता है
जिसे ज्ञात हो
दृग भाषा,
अतल
में
उतर कर जो ढूंढ लाए अमर प्रणय
मणि, उसे ही मिलता है अनंत
सुख जीवन दहन में, जीवन
का सौंदर्य छुपा रहता है
अदृश्य उष्ण श्वास
के छुअन में ।
- - शांतनु सान्याल

10 जुलाई, 2025

शब्दों के उस पार - -

अंधकारमयी नदी ढूंढती है

जुन्हाई भरा किनारा,
अंतःस्थल के गहन
में रहता है
अंतहीन
उजियारा ।

मृग और मृगया के दरमियां
है बचे रहने का संघर्ष,
निर्बल की मृत्यु है
तय बाकी
भानुमति
का पिटारा ।

ख़्वाबों का फेरीवाला बेच
जाता है रंगीन बुलबुले,
शून्य हथेलियों में
रह जाता है
मृत आदिम
सितारा ।

हर सुबह देखता हूँ मैं दिगंत
के बदलते हुए रंग को
हर मोड़ पे वही
मदारी जमूरे
वाले खेल
का
नज़ारा ।

खड़ा हूँ अंतिम छोर में लिए
वजूद का प्रमाण पत्र
बिखरे पड़े हैं
मुखौटे उठ
चुका
मीना बाज़ार
सारा ।
- - शांतनु सान्याल












08 जुलाई, 2025

अधूरा अभियान - -

ऐनक की खोज में नज़र खो आए हम,
बंजर ज़मीन थी या खोखले बीज,
मुद्दतों से तकते रहे कोई अंकुर
तो उभरे सुबह की नरम
धूप में, उम्मीद का
पसारा ले कर
न जाने क्या
बो आए
हम,
ऐनक की खोज में नज़र खो आए हम ।
निरुत्तर थे सभी दर्शक इंद्रप्रस्थ वाले,
उन्मुक्त केश उड़ते रहे हवाओं
में रक्त स्नान असमाप्त
रहा आदिम युग से
आज तक, वही
अभिशापित
अट्टहास,
वही
हिंस्र ख़ामोशी, हर बार रुदाली बन रो
आए हम, ऐनक की खोज में
नज़र खो आए हम ।
निकल ही न पाए
चार पैशाचिक
मुहर के
बाहर,
बस खेलते रहे वर्ण परिचय का चौसर,
कहने को कर आए समस्त तीर्थ
दर्शन, ये और बात है कि
अंतर दाग़ न धो पाए
हम, ऐनक की
खोज में
नज़र
खो आए हम ।
- - शांतनु सान्याल


07 जुलाई, 2025

शीर्षक विहीन - -

न जाने किस जानिब जाती हैं दुआओं की राहें,

इसी इंतज़ार में उम्र गुज़री शायद वो लौट आएं,

कहीं दूर वादियों में उतरते हैं घने बादलों के डेरे,
बियाबां के बाशिन्दे आख़िर जाएं तो कहाँ जाएं,

फूलों की रहगुज़र में हम छोड़ आए दिल अपना,
कोहसारों के दरमियां भटकती हैं ख़ामोश सदाएं,

धुंध की तरह बिखरी हुई हैं हरसू दिलनवाज़ यादें
जी चाहता है फिर इक बार वहीं रेत के घर बनाएं,
- -  शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past