05 अप्रैल, 2025

कहाँ हूँ मैं - -

एक अद्भुत अनुभूति से गुज़र रहा हूँ मैं,

अपनी ही परछाई से जैसे डर रहा हूँ मैं,

यूँतो मुस्कुराते हुए लोग हाथ मिलाते हैं,
डूबते दिल की गहराई से उभर रहा हूँ मैं,

रात भर सोचता रहा रुक ही जाऊँ यहीं,
कभी एक सायादार गुलमोहर रहा हूँ मैं,

राजपथ के दोनों तरफ़ हैं विस्मित चेहरे,
आँखों में फिर कोई ख़्वाब भर रहा हूँ मैं,

न कोई जुलूस है, न ही विप्लवी शोरगुल,
जनारण्य के मध्य, एक खंडहर रहा हूँ मैं,

धुँधली साया मां की आवाज़ से बुलाए है,
घर लौट जाऊं, मुद्दतों दर ब दर रहा हूँ मैं,

यक़ीन नहीं होता अपनी ही याददाश्त पर,
ये वही जगह है दोस्तों कभी इधर रहा हूँ मैं,
- - शांतनु सान्याल


03 अप्रैल, 2025

विकल्प विहीन - -

दो चकमक पत्थरों के बीच की चिंगारी,दूर तक जला जाती है स्मृति नगर सारी,

पड़े रहते हैं कुछ एक अधजले अनुभूति,
फिर भी जीवन का चलना रहता है जारी,

अनवरत चलायमान है देह का पुनर्वासन,
एकमेव जन्म में, हज़ार जन्मों की तैयारी,

आसपास बिखरे पड़े हैं असंख्य आत्माएं,
सहज नहीं कहना, कब आए अपनी बारी,

कागज़ी फूल ही सही ये रिश्तों की दुनिया,
गन्धहीन कोषों में बसता है प्रणय भिखारी,

दीवार से लटकी पड़ी है एक बूढ़ी बंद घड़ी,
वक़्त का ऋण चुकाना पड़ता है बहुत भारी,

कोई विकल्प काम नहीं आता अंतिम पहर,
सामने खड़े हैं जब धर्मराज दंड गदा धारी ।
- - शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past