Follow by Email

Sunday, 7 June 2015

इक अजनबी - -

न उजाड़ यूँ लम्हों में जज़्बात ए शहर,
इक ज़िन्दगी भी कम है इसे
जगमगाने के लिए।
क़दमों में जड़े
हों ज़ंजीर
और
नंगी पीठ पे उभरे दाग़ ए चाबुक, ये -
सौगात भी कम हैं मुहोब्बत में,
यूँ हद से गुज़र जाने के
लिए। वो कोई
इंतहाई
दीवाना था या ख़ालिस रूह, यूँ उठाए
फिरता रहा काँधे पे, पोशीदा
सलीब अपना, किसी
ने उसे नहीं
देखा,
न किसी ने पहचाना ही, लहूलुहान वो
गुज़रता रहा भीड़ में तनहा,
इंसानियत की सज़ा
पाने के लिए।
न उजाड़
यूँ लम्हों में जज़्बात ए शहर, इक - -
ज़िन्दगी भी कम है इसे
जगमगाने के लिए।
* *
- शांतनु सान्याल
 http://sanyalsduniya2.blogspot.in/