Saturday, 28 September 2013

आग़ाज़ सफ़र - -

कुछ यादें जो चुभती हैं कांटों की तरह,
उन्हें वक़्त रहते निकाल फेंकना 
है बेहतर, नासूर न हो जाए 
कहीं दर्द ए जिगर
मेरा, वो 
राह 
जो ख़ुद में ही हो उलझा हुआ, रात - - 
गहराने से पहले उसे भूलना है 
बेहतर, हर क़दम पे 
ज़िन्दगी लेती 
है इम्तहां,
और 
दे जाती है हर बार सबक़ नया, गिरह 
जो न खुल पाए वक़्त रहते उसे 
तोड़ना है बेहतर, न तू ही 
है कोई सिकंदर, न 
ही मेरी मंज़िल 
आख़िर,
यहीं से है मेरा आग़ाज़ सफ़र, अब जो 
भी हो आगे, देखा जाएगा - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
 आग़ाज़ सफ़र - यात्रा की शुरुआत 


http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
painting by artist Jacqueline Gnott 1