30 जुलाई, 2026

अन्तर प्लावन - -

पृथ्वी और आकाश जब एकाकार, सघन गाढ़ अंधकार, मर्म को

स्पर्श करती हुई आदिम
बरसात, टूट जाते हैं
शीशे के सभी
दीवार, रोके
रुकते
नहीं
विक्षिप्त अभिलाषित जलधार, पृथ्वी और आकाश जब एकाकार । सब
कुछ बह जाता है क्षण में हम
देखते रह जाते हैं अवाक,
उन निःशब्द पलों में
जीवन पा जाता
है आत्म सुख
अपरम्पार,
इस
असीम डूब में निहित है सारा संसार,
पृथ्वी और आकाश जब
एकाकार ।
-- शांतनु सान्याल

3 टिप्‍पणियां:

  1. सब एकाकार ही है बस फर्क है उन्हें अलग करती सीमा रेखाओं का।
    बहूत अच्छी रचना सर।
    सादर।
    -----
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३१ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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