Wednesday, 22 November 2017

मुसाफ़िर - -

कहीं न कहीं हम सभी हैं
मुसाफ़िर इक रात के,
कभी रुपहली
शब में
और कभी ज़ुल्मात में - -
किसे ख़बर क्या
मानी रहे
अपनी
 मुलाक़ात के। कुछ
तिश्नगी ऐसी
 कि बुझाए
तो उम्र
गुज़रे - - कुछ आग
रहे ताउम्र ज़िंदा
गुजिश्ता
बरसात के। तुम्हारी
निगाह में जो
हम इक
बार क़ैद हुए - - अब
दीन ओ दुनिया,
फ़क़त हैं मौज़ू
जज़्बात
के।

* *
- शांतनु सान्याल


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