Monday, 14 December 2015

इस छोर से उस अंत तक - -

सूरज की है अपनी ही -
मजबूरी, शाम से
पहले उसका
डूबना है
ज़रूरी। जीवन की नाव,
और अंतहीन बहाव,
फिर भी घाट
तक
पहुंचना है ज़रूरी। जले
हैं मंदिर द्वार के
दीप, गहन
अंधकार
है बहुत समीप, फिर भी,
किसी तरह से अंतर्मन
को छूना है
ज़रूरी।
मल्लाह और किनारे के
दरमियान, शायद था
कोई अदृश्य
आसमान,
इस
छोर से उस अंत तक,
हर हाल में जीवन
का बहना है
ज़रूरी।

* *
- शांतनु सान्याल

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