Saturday, 9 September 2017

दूर तक कोई नहीं - -

वैसे तो यहाँ  रहनुमाओं की
कोई कमी नहीं, फिर भी
ज़िन्दगी लौट आती
है अक्सर किसी
अवितरित
लिफ़ाफ़े की तरह, उम्र से
पहले बुढ़ापा ओढ़े हुए, 
दहलीज़ पर अपने,
बेतरतीब से
पड़े हुए।
तुम्हारे और मेरे दरमियान
आज भी है मौजूद शायद
वही पुराना पुल,
 हालाँकि
वक़्त ने बहती नदी को,
बहोत पहले ही चुरा
लिया हमसे, न
अब कोई
किनारा
रहा बाक़ी, और नहीं क़दमों
के निशां दूर तक, दस्तूर
ए ज़माने को बदलना
इतना भी
आसान
नहीं, माथे  से जब क़फ़न
हमने उतारा तो देखा,
तनहा खड़े थे हम
बीच चौक पर,
और ओझल
थे सभी
कारवां दूर तक।

* *
- शांतनु सान्याल