Sunday, 11 August 2013

आख़री पहर - -

साअत गुज़िश्ता तुम थे, जिस्म ओ जां -
पे छाए, किसी शब ए गुल की 
मानिंद, सदा बहार कोई 
ख़ुशबू ! जाती नहीं 
ख़ुमारी अब 
तलक,
दिल ओ ज़ेहन से, जबकि दिन ढलने को 
है कुछ लम्हा बाक़ी, फिर तेरा 
इंतज़ार भर चला है - 
पुराने ज़ख्म 
धीरे धीरे, 
फिर जलने की ख़्वाहिश लिए ज़िंदगी - -
तकती है बुझे चिराग़ की जानिब,
फिर चाहता है दिल तुझे
अहसास करना 
रूह ए 
गहराई तक, फिर निगाहों की चांदनी में 
बिखरने की आरज़ू है कहीं -
बेक़रार ज़िन्दगी 
को - - 
* * 
- शांतनु सान्याल

साअत गुज़िश्ता- आखरी पहर 
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