Saturday, 24 March 2012


परिचयहीन 

अर्थहीन न थी वो अंतर्मन की यात्रा, इसी 
बहाने सही, स्वयं को पहचानने 
का तो अवसर मिला, मैं 
चाह कर भी उसे 
भूला न 
सका, वो चाह कर भी मेरे समीप आ न 
सका, इस नीरवता में थे न जाने 
कितने भावनाएं समाधिस्थ, 
द्वार तक पग बढे थे 
लेकिन पा कर 
भी उसे 
पा न सका, गंतव्य था मेरे सामने बांह 
फैलाए, क़दम उठने से पहले 
ढह गए सभी ताश के 
घर सहसा, हाथ
बढे 
लेकिन छलकता जाम उठा न सका, फिर 
जीत गए तुम नियति के साथ,
अप्रत्याशित भू कम्पन, 
उस मोड़ तक मैं 
जा न सका, 
पा के 
भी तुम्हें पा न सका, अपना परिचय बता न 
सका. 

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/ 
Art Quiet Pond by  Robert Kuhn