Wednesday, 24 August 2011

ग़ज़ल

अट्टहास के बीच ज़िन्दगी बेलिबास खड़ी
वक़्त की मेहरबानियाँ भी कुछ कम नहीं,

खींच लो जितना चाहों सांसों की रफ़्तार -
मज़िल पे कभी तुम और कभी हम नहीं,

इस दौर में हर कोई, खुद से है मुख़ातिब 
आइना  ख़ामोश, कि मुझे भी शरम नहीं,

बाँध लो निगाहों में पट्टियाँ ये रहनुमाओं
जान के भूली है राहें, मेरा कोई वहम नहीं,

मालूम है मुझे ज़माने की रस्मे वफ़ादारी
दौलत पे निगूँ सर, इनका कोई धरम नहीं,

वो फिर बनेगे शहंशाह लूट कर सारा शहर
करो राजतिलक, रोके कोई वो क़सम नहीं,

इस तरह जीने की आदत मुझे रास नहीं -
ये ज़हर है  मीठा, ये इलाजे  मलहम  नहीं,

उठो भी आसमानों से दहकते शक्ले तूफां
थाम ले  शैलाबे जुनूं, किसी में वो दम नहीं.

-- शांतनु सान्याल

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